The Hindu Editorial in Hindi
25 June 2026
भारत में समय पर ट्रॉमा केयर का रास्ता साफ़ करना
(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)
Topic: GS-2: स्वास्थ्य प्रशासन | न्यायपालिका | सहकारी संघवाद , GS-2/GS-3: सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा | आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली
संदर्भ
26 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने SaveLIFE Foundation बनाम भारत संघ मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया।
न्यायालय ने कहा कि ट्रॉमा केयर (Trauma Care) अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार (Right to Life) का अभिन्न हिस्सा है।
इस निर्णय के माध्यम से न्यायालय ने केंद्र सरकार, राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को एक एकीकृत ट्रॉमा-केयर प्रणाली विकसित करने हेतु बाध्यकारी निर्देश जारी किए।

ट्रॉमा केयर क्यों महत्वपूर्ण है?
• भारत में प्रतिवर्ष लगभग 4.67 लाख चोट-संबंधी मृत्यु होती हैं।
• सड़क दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष लगभग 1.77 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
• 18–45 वर्ष आयु वर्ग में मृत्यु का प्रमुख कारण ट्रॉमा है।
विधि आयोग (201वीं रिपोर्ट):
• लगभग 50% सड़क दुर्घटना मृत्यु समय पर उपचार मिलने पर रोकी जा सकती हैं।
नीति आयोग–AIIMS आपातकालीन देखभाल रिपोर्ट (2021):
• लगभग 30% मौतें आपातकालीन प्रतिक्रिया में देरी से जुड़ी हुई हैं।
मुख्य मुद्दा
भारत में ट्रॉमा केयर से संबंधित नीतियाँ और दिशानिर्देश पहले से मौजूद हैं।
लेकिन निम्न तत्वों की कमी रही है:
• एकसमान कार्यान्वयन
• जवाबदेही
• समयबद्ध अनुपालन
• एकीकृत आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली
सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?
• ट्रॉमा केयर अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
• यह अधिकार दुर्घटना स्थल से लेकर अंतिम उपचार तक विस्तारित होता है।
इसमें शामिल हैं:
• दुर्घटना स्थल पर सहायता
• आपातकालीन प्रतिक्रिया
• एम्बुलेंस सेवाएँ
• अस्पताल में उपचार
• अंतिम एवं समुचित चिकित्सा देखभाल
यह निर्णय निम्नलिखित मामलों पर आधारित है:
• Parmanand Katara v. Union of India (1989)
• Paschim Banga Khet Mazdoor Samity v. State of West Bengal (1996)
न्यायालय के प्रमुख निर्देश
आपातकालीन संचार प्रणाली
• सभी आपातकालीन नंबरों को 112 से एकीकृत किया जाए।
• व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
• एकीकृत आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र विकसित किया जाए।
गुड समैरिटन (Good Samaritan) संरक्षण
• राज्य स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए।
• दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले नागरिकों को संरक्षण दिया जाए।
• राज्य एवं जिला स्तर पर नोडल प्राधिकरण नियुक्त किए जाएँ।
एम्बुलेंस सुधार
• सभी एम्बुलेंस राष्ट्रीय एम्बुलेंस कोड (National Ambulance Code) के अनुरूप हों।
• GPS प्रणाली अनिवार्य रूप से लगाई जाए।
• ERSS-112 के साथ रियल-टाइम ट्रैकिंग सुनिश्चित की जाए।
• प्रतिक्रिया समय एवं परिणामों की नियमित निगरानी की जाए।
ट्रॉमा सुविधाओं का मानचित्रण
• अस्पतालों को उनकी ट्रॉमा-केयर क्षमता के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाए।
• उपलब्ध सुविधाओं की सार्वजनिक जानकारी पारदर्शी रूप से उपलब्ध कराई जाए।
• बेहतर रेफरल एवं रोगी-मार्गदर्शन प्रणाली विकसित की जाए।
राष्ट्रीय ट्रॉमा रजिस्ट्री
• राष्ट्रीय ट्रॉमा रजिस्ट्री ढाँचा विकसित किया जाए।
• राज्य स्तरीय ट्रॉमा रजिस्ट्रियों को एकीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस से जोड़ा जाए।
• मानकीकृत डेटा संग्रह एवं रिपोर्टिंग प्रणाली लागू की जाए।
PM RAHAT का कार्यान्वयन
राज्यों को निम्न योजना लागू करने का निर्देश दिया गया:
प्रधानमंत्री सड़क दुर्घटना पीड़ित अस्पतालकरण एवं सुनिश्चित उपचार योजना (PM RAHAT)
• सड़क दुर्घटना पीड़ितों को कैशलेस उपचार उपलब्ध कराया जाए।
• गोल्डन ऑवर (Golden Hour) के दौरान मृत्यु दर कम करने पर विशेष ध्यान दिया जाए।
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का दृष्टिकोण
• सार्वजनिक स्वास्थ्य और अस्पताल राज्य सूची के विषय हैं।
अतः:
• केंद्र सरकार मानक निर्धारक एवं समन्वयक की भूमिका निभाएगी।
• राज्य कार्यान्वयन की जिम्मेदारी निभाएँगे।
• राष्ट्रीय मानकों के साथ स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाएगा।
निर्णय द्वारा समर्थित प्रमुख ढाँचे
• ERSS-112
• National Ambulance Code (AIS-125)
• Good Samaritan Guidelines
• EMT Curriculum
• Trauma Care Guidelines
• PM RAHAT Scheme
निर्णय का महत्व
अधिकार-आधारित दृष्टिकोण
• ट्रॉमा केयर को कल्याणकारी उपाय (Welfare Measure) से आगे बढ़ाकर संवैधानिक दायित्व बना दिया गया है।
समग्र प्रणाली सुधार
• केवल अस्पतालों पर नहीं, बल्कि संपूर्ण आपातकालीन देखभाल श्रृंखला पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
अधिक जवाबदेही
• अनुपालन शपथपत्र (Compliance Affidavits) प्रस्तुत किए जाएँगे।
• सर्वोच्च न्यायालय निगरानी करेगा।
• राज्यों को Action Taken Reports प्रस्तुत करनी होंगी।
रोकथाम योग्य मृत्यु में कमी
• त्वरित प्रतिक्रिया से मृत्यु और विकलांगता दोनों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
चुनौतियाँ
• राज्यों के बीच स्वास्थ्य अवसंरचना में असमानता।
• ग्रामीण क्षेत्रों में एम्बुलेंस की कमी।
• बड़े शहरों के बाहर ट्रॉमा सुविधाओं का अभाव।
• आपातकालीन सेवाओं के एकीकरण में देरी।
• प्रशिक्षित EMT एवं ट्रॉमा विशेषज्ञों की कमी।
• राज्यों पर वित्तीय बोझ।
आगे की राह
• जिला स्तर पर ट्रॉमा केंद्रों को सुदृढ़ किया जाए।
• ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में एम्बुलेंस कवरेज बढ़ाया जाए।
• सभी आपातकालीन सेवाओं को 112 से पूर्णतः जोड़ा जाए।
• रियल-टाइम ट्रॉमा रजिस्ट्रियाँ विकसित की जाएँ।
• EMT प्रशिक्षण एवं प्रमाणन प्रणाली को मजबूत किया जाए।
• परिणाम-आधारित निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।
UPSC वैल्यू एडिशन
अनुच्छेद 21
जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।
न्यायिक व्याख्या के अनुसार इसमें शामिल हैं:
• आपातकालीन चिकित्सा सुविधा
• स्वास्थ्य सेवाएँ
• मानवीय गरिमा
गुड समैरिटन दिशानिर्देश
• दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले नागरिकों को कानूनी उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
• तत्काल बचाव कार्य को प्रोत्साहित करते हैं।
PM RAHAT
• सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए कैशलेस उपचार योजना।
• गोल्डन ऑवर के दौरान मृत्यु दर कम करने का उद्देश्य।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रॉमा केयर को केवल एक नीतिगत लक्ष्य नहीं, बल्कि संवैधानिक उत्तरदायित्व में परिवर्तित कर दिया है। अब वास्तविक चुनौती इसके प्रभावी क्रियान्वयन में है, ताकि देश का प्रत्येक दुर्घटना पीड़ित स्थान, आय अथवा सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना समय पर आपातकालीन चिकित्सा सहायता प्राप्त कर सके।