The Hindu Editorial in Hindi
11 July 2026
आतंकवाद से जुड़े डेटा में कमी से उभरते वैश्विक खतरों का पता नहीं चल पा रहा है।
(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)
विषय: GS-3: आंतरिक सुरक्षा | आतंकवाद | सीमा प्रबंधन | साइबर सुरक्षा, GS-2: अंतर्राष्ट्रीय संबंध | वैश्विक सुरक्षा | अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
संदर्भ
हालिया वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2025 में आतंकवाद से संबंधित मौतों और हमलों में कमी दर्ज की गई है।
हालाँकि, संपादकीय का तर्क है कि यह सांख्यिकीय सुधार आतंकवाद की बदलती प्रकृति को छिपाता है, जो अब अधिक विकेंद्रीकृत, प्रौद्योगिकी-आधारित और भौगोलिक रूप से सीमित क्षेत्रों में केंद्रित हो गया है।
मूल मुद्दा
आतंकवाद समाप्त नहीं हो रहा है, बल्कि अधिक अनुकूलनशील, स्थानीयकृत और डिजिटल माध्यमों से संचालित स्वरूप में विकसित हो रहा है।
केवल घटते वैश्विक आँकड़ों पर निर्भर रहना नीतिगत शिथिलता उत्पन्न कर सकता है तथा दीर्घकालिक आतंकवाद-रोधी तैयारियों को कमजोर कर सकता है।
मुख्य बिंदु
वैश्विक प्रवृत्तियाँ
• वर्ष 2025 में आतंकवाद से संबंधित मौतों में लगभग 28% की कमी दर्ज की गई।
• कुल आतंकवादी हमलों में लगभग 22% की कमी आई।
• 81 देशों में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति में सुधार दर्ज किया गया।
उभरती वास्तविकता
• वैश्विक आतंकवाद से संबंधित लगभग 70% मौतें केवल पाँच देशों में केंद्रित हैं।
• उप-सहारा अफ्रीका का साहेल क्षेत्र वैश्विक आतंकवादी मौतों के आधे से अधिक मामलों के लिए उत्तरदायी है।
• वर्तमान में 60% से अधिक आतंकवादी हमले अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से 100 किलोमीटर के भीतर होते हैं।
स्थिर पृष्ठभूमि
आतंकवाद
राजनीतिक, वैचारिक या धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु भय उत्पन्न करने के लिए हिंसा का प्रयोग या उसकी धमकी देना।
आतंकवाद की वर्तमान विशेषताएँ
• विकेंद्रीकृत नेटवर्क
• अकेले हमलावर (Lone-Wolf Attacks)
• ऑनलाइन कट्टरपंथीकरण
• सीमा-पार लॉजिस्टिक नेटवर्क
प्रमुख वैश्विक आतंकवादी संगठन
• इस्लामिक स्टेट (IS)
• जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन (JNIM)
• तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP)
• बोको हराम
• अल-शबाब
मुख्य आयाम
आतंकवाद की बदलती प्रकृति
• बड़े संगठित हमलों से विकेंद्रीकृत हिंसा की ओर बदलाव।
• एन्क्रिप्टेड संचार एवं सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग।
• अकेले हमलावरों द्वारा कट्टरपंथी गतिविधियों में वृद्धि।
• भौतिक नेटवर्क के स्थान पर डिजिटल भर्ती तंत्र का विस्तार।
संघर्ष–आतंकवाद संबंध
• राजनीतिक अस्थिरता उग्रवाद के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है।
• कमजोर शासन व्यवस्था आतंकवादी सुरक्षित ठिकानों को बढ़ावा देती है।
• गृहयुद्ध और राज्य व्यवस्था के विघटन से आतंकवादी भर्ती में वृद्धि होती है।
सीमावर्ती आयाम
• आतंकवाद अब अधिकतर छिद्रयुक्त सीमावर्ती क्षेत्रों में फल-फूल रहा है।
• अवैध हथियार, मादक पदार्थों की तस्करी तथा मानव तस्करी आतंकवाद के वित्तपोषण को मजबूत करते हैं।
• सीमावर्ती जिले आतंकवादी संगठनों के संचालन केंद्र बनते जा रहे हैं।
प्रौद्योगिकी एवं कट्टरपंथीकरण
• ऑनलाइन प्रचार-प्रसार से आतंकवादी भर्ती तेज हो रही है।
• कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित सामग्री एवं एन्क्रिप्टेड प्लेटफ़ॉर्म निगरानी को जटिल बना रहे हैं।
• डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र सीमा-पार उग्रवादी समन्वय को सक्षम बना रहे हैं।
भारत के लिए निहितार्थ
सुरक्षा चुनौतियाँ
• सीमा-पार आतंकवाद
• डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से कट्टरपंथीकरण
• ड्रोन आधारित घुसपैठ
• नार्को-आतंकवाद
• अनौपचारिक वित्तीय माध्यमों से आतंकवाद का वित्तपोषण
रणनीतिक प्राथमिकताएँ
• खुफिया-आधारित पुलिसिंग
• सीमावर्ती अवसंरचना का विकास
• अंतरराष्ट्रीय खुफिया सहयोग
• प्रति-कट्टरपंथीकरण कार्यक्रम
• संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप साइबर निगरानी एवं डिजिटल मॉनिटरिंग
आलोचनात्मक विश्लेषण
सकारात्मक पक्ष
• वैश्विक स्तर पर आतंकवाद से संबंधित मौतों में कमी बेहतर खुफिया एवं सुरक्षा अभियानों का संकेत देती है।
• अंतरराष्ट्रीय सहयोग से कई संगठित आतंकवादी नेटवर्क कमजोर हुए हैं।
• वित्तीय प्रतिबंधों एवं खुफिया साझेदारी ने प्रमुख आतंकवादी संगठनों की क्षमता को सीमित किया है।
सीमाएँ
• समग्र आँकड़े क्षेत्रीय हिंसा की वास्तविक तीव्रता को छिपा देते हैं।
• आतंकवादी संगठन अधिक विखंडित तथा लचीले बन गए हैं।
• डिजिटल कट्टरपंथीकरण नियामक क्षमता से तेज़ी से बढ़ रहा है।
• पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण एशिया में जारी संघर्ष उग्रवाद को निरंतर बढ़ावा दे रहे हैं।
आगे की राह
• प्रतिक्रियात्मक आतंकवाद-रोधी रणनीतियों के स्थान पर निवारक रणनीतियों को अपनाया जाए।
• संघर्षग्रस्त एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में सुशासन को सुदृढ़ किया जाए।
• अंतरराष्ट्रीय खुफिया साझेदारी को और मजबूत बनाया जाए।
• AI-संचालित कट्टरपंथीकरण एवं ऑनलाइन भर्ती से निपटने के लिए उन्नत क्षमताएँ विकसित की जाएँ।
• सामुदायिक पुलिसिंग एवं प्रति-कट्टरपंथीकरण कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए।
• साइबर फॉरेंसिक एवं डिजिटल निगरानी को सुदृढ़ करते हुए नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
• उन सामाजिक-आर्थिक कारणों का समाधान किया जाए जो उग्रवादी भर्ती को बढ़ावा देते हैं।