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The Hindu Editorial in Hindi

13 July 2026

इज़राइल के अलग-थलग पड़ने की प्रक्रिया

(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)

विषय: GS 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध, पश्चिम एशिया, भारत की विदेश नीति) · GS 2 (वैश्विक समूह, कूटनीति, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं) · निबंध (संघर्ष, कूटनीति, सुरक्षा)

संदर्भ

संपादकीय का तर्क है कि गाज़ा संघर्ष तथा क्षेत्रीय सैन्य अभियानों के बाद सैन्य रूप से मजबूत होने के बावजूद इज़राइल राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से लगातार अधिक अलग-थलग होता जा रहा है।

संपादकीय के अनुसार, सैन्य शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता, बस्तियों (Settlements) का विस्तार तथा लंबे समय तक जारी संघर्ष ने इज़राइल की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कमजोर किया है, सहयोगी देशों के साथ संबंधों में तनाव बढ़ाया है तथा दीर्घकालिक क्षेत्रीय शांति की संभावनाओं को प्रभावित किया है।

मुद्दा संक्षेप में

• गाज़ा, लेबनान, सीरिया और ईरान में इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों ने क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाई है तथा उसकी कूटनीतिक स्वीकार्यता को सीमित किया है।
• गाज़ा में मानवीय संकट, पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) में बस्तियों का विस्तार तथा बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचना के कारण इज़राइल का कूटनीतिक अलगाव बढ़ा है।
• परंपरागत सहयोगी, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका, भी अब इज़राइल की दीर्घकालिक रणनीतिक दिशा को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं।

स्थिर पृष्ठभूमि

• संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना के बाद वर्ष 1948 में इज़राइल की स्थापना हुई।
• स्थापना के बाद से इज़राइल ने क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करते हुए अंतरराष्ट्रीय वैधता प्राप्त करने का प्रयास किया।

क्षेत्रीय अलगाव कम करने वाले प्रमुख पड़ाव

• मिस्र के साथ शांति संधि (1979)
• जॉर्डन के साथ शांति संधि (1994)
• अब्राहम समझौते (2020) – संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान के साथ

अब्राहम समझौतों का आधार

• आर्थिक सहयोग
• प्रौद्योगिकी साझेदारी
• ईरान को लेकर साझा रणनीतिक चिंताएँ

मुख्य आयाम

बढ़ता अंतरराष्ट्रीय अलगाव

• गाज़ा में व्यापक विनाश ने वैश्विक जनमत को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है।
• मानवीय संकट और नागरिक हताहतों के कारण ग्लोबल साउथ, यूरोप तथा बहुपक्षीय मंचों पर आलोचना बढ़ी है।
• सैन्य सफलताएँ कूटनीतिक वैधता में परिवर्तित नहीं हो सकीं।

सैन्य रणनीति की सीमाएँ

• सैन्य श्रेष्ठता राजनीतिक वार्ता का स्थायी विकल्प नहीं हो सकती।
• सामरिक (Tactical) जीतें दीर्घकालिक रणनीतिक (Strategic) लागत उत्पन्न कर सकती हैं।
• लगातार संघर्षों ने पश्चिम एशिया में अस्थिरता को और बढ़ाया है।

खाड़ी देशों के साथ संबंधों में तनाव

• खाड़ी देश अब भी ईरान को लेकर चिंतित हैं।
• हालांकि, वे लंबे सैन्य संघर्ष की अपेक्षा क्षेत्रीय स्थिरता को अधिक महत्व दे रहे हैं।
• इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों ने क्षेत्रीय सामान्यीकरण (Normalization) की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है।

अमेरिका–इज़राइल संबंधों पर दबाव

• संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों को लेकर नीतिगत मतभेद बढ़ रहे हैं।
• यह चिंता बढ़ रही है कि लंबे समय तक जारी संघर्ष पश्चिम एशिया में अमेरिका के व्यापक रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकता है।
• यद्यपि दोनों देशों का गठबंधन मजबूत है, परंतु बिना शर्त राजनीतिक समर्थन को अब निश्चित नहीं माना जा सकता।

वेस्ट बैंक की बस्तियाँ

• इज़राइली बस्तियों का विस्तार लगातार जारी है।
• इससे व्यवहारिक दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) की संभावना लगातार कम होती जा रही है।
• बसने वालों (Settlers) द्वारा की जाने वाली हिंसा भी इज़राइल की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुँचा रही है।

आलोचनात्मक विश्लेषण

इज़राइल की स्थिति की प्रमुख शक्तियाँ

• मजबूत सैन्य क्षमता एवं उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी।
• संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी।
• उच्च तकनीकी एवं आर्थिक क्षमता।
• अब्राहम समझौतों के माध्यम से कई अरब देशों के साथ सफल संबंध सामान्यीकरण।

संरचनात्मक चुनौतियाँ

• सैन्य सफलता के बावजूद बढ़ता कूटनीतिक अलगाव।
• मानवीय संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय वैधता में कमी।
• बस्तियों के विस्तार से वार्तापरक शांति की संभावनाएँ कमजोर होना।
• बढ़ता क्षेत्रीय असंतोष, जिससे दीर्घकालिक सुरक्षा जोखिम उत्पन्न हो रहे हैं।
• सामरिक सैन्य उपलब्धियों और दीर्घकालिक राजनीतिक परिणामों के बीच बढ़ता अंतर।

आगे की राह

• दो-राष्ट्र समाधान की दिशा में सार्थक राजनीतिक संवाद को पुनर्जीवित किया जाए।
• अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (International Humanitarian Law) का प्रभावी पालन सुनिश्चित कर नागरिक हताहतों को कम किया जाए।
• फ़िलिस्तीनी प्रतिनिधियों के साथ विश्वास-निर्माण उपायों को पुनः प्रारंभ किया जाए।
• अब्राहम समझौतों के अंतर्गत क्षेत्रीय सहयोग को कूटनीतिक संवाद के माध्यम से मजबूत किया जाए।
• संयुक्त राष्ट्र तथा क्षेत्रीय हितधारकों की भागीदारी से बहुपक्षीय प्रयासों को बढ़ावा देकर तनाव कम किया जाए।

भारत का दृष्टिकोण

• भारत शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर आधारित दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है।
• भारत इज़राइल के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखते हुए फ़िलिस्तीनी जनता की वैध आकांक्षाओं का भी समर्थन करता है।

भारत की नीति के प्रमुख आधार

• संवाद एवं कूटनीति
• अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान
• मानवीय सहायता
• क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता


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