Achieve your IAS dreams with The Core IAS – Your Gateway to Success in Civil Services

The Hindu Editorial in Hindi

06 July 2026

आधिकारिक दस्तावेज़ों से परे, अपनापन महसूस करने का अधिकार

(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)

विषय: GS-2: राजव्यवस्था | संविधान | शासन-व्यवस्था | नागरिकता, GS-1: भारतीय समाज | मौलिक अधिकार

संदर्भ

विदेश मंत्रालय (MEA) की हालिया टिप्पणियों, निर्वाचन नामावली पुनरीक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों तथा नागरिकता की संवैधानिक अवधारणा को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में यह संपादकीय नागरिकता के व्यापक अर्थ पर प्रकाश डालता है।

संपादकीय का तर्क है कि नागरिकता को केवल दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं किया जा सकता; यह संविधान के मूल्यों पर आधारित एक संवैधानिक संबंध है।

मुख्य मुद्दा

  • बहस अब “कौन नागरिक है?” से आगे बढ़कर “कोई नागरिक अपनी नागरिकता कैसे सिद्ध करे?” पर केंद्रित हो गई है।
  • दस्तावेज़ों पर अत्यधिक निर्भरता वास्तविक नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर सकती है।

संवैधानिक पृष्ठभूमि

भाग-II (अनुच्छेद 5–11)

  • संविधान लागू होने के समय की नागरिकता का निर्धारण करता है।
  • अनुच्छेद 11 के तहत संसद को नागरिकता संबंधी कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है।

नागरिकता अधिनियम, 1955

  • नागरिकता प्राप्त करने, समाप्त करने एवं निर्धारण से संबंधित प्रमुख कानून।
  • समय-समय पर बदलती परिस्थितियों के अनुसार इसमें संशोधन किए गए हैं।

प्रमुख तर्क

दस्तावेज़ों से परे नागरिकता

  • नागरिकता केवल दस्तावेज़ों का स्वामित्व नहीं, बल्कि एक संवैधानिक दर्जा है।
  • पासपोर्ट सामान्यतः नागरिकता का प्रमाण होता है; इसे केवल यात्रा दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता।
  • दस्तावेज़ों में कमी होने मात्र से किसी व्यक्ति को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

संविधान की मूल दृष्टि

नागरिकता निम्नलिखित मूल्यों पर आधारित है—

  • समानता
  • धर्मनिरपेक्षता
  • मानव गरिमा
  • भेदभाव-रहित व्यवस्था

संविधान सभा ने धर्म-आधारित नागरिकता की अवधारणा को अस्वीकार किया था।

न्यायिक चिंताएँ

  • नागरिकता सिद्ध करने का दायित्व धीरे-धीरे व्यक्तियों पर स्थानांतरित होता दिखाई दे रहा है।
  • प्रशासनिक सत्यापन, सक्षम वैधानिक प्राधिकारी द्वारा किए जाने वाले कानूनी निर्धारण का विकल्प नहीं हो सकता।
  • दस्तावेज़ी अनिश्चितता के कारण नागरिकों के अधिकार अनिश्चितकाल तक स्थगित नहीं रह सकते।

प्रमुख संवैधानिक सिद्धांत

  • अनुच्छेद 14 – विधि के समक्ष समानता
  • अनुच्छेद 21 – जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
  • अनुच्छेद 19 – केवल नागरिकों को उपलब्ध मौलिक अधिकार

नागरिकता लोकतांत्रिक भागीदारी, मतदान के अधिकार तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार है।

UPSC Value Addition

प्रमुख शब्द (Keywords)

  • संवैधानिक नागरिकता
  • विधि का शासन (Rule of Law)
  • विधिसम्मत प्रक्रिया (Due Process)
  • व्यक्तित्व (Personhood)
  • समानता
  • धर्मनिरपेक्षता
  • दस्तावेज़ीय पहचान
  • लोकतांत्रिक समावेशन

समालोचनात्मक विश्लेषण

सकारात्मक पक्ष

  • नागरिकता को व्यक्ति एवं राज्य के बीच संवैधानिक संबंध के रूप में स्थापित करता है।
  • लोकतांत्रिक समावेशन एवं समान व्यवहार को सुदृढ़ करता है।
  • अत्यधिक प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं के आधार पर अधिकारों से मनमाने ढंग से वंचित होने से सुरक्षा प्रदान करता है।

सीमाएँ

  • राष्ट्रीय सुरक्षा एवं निर्वाचन की शुचिता के लिए सत्यापन व्यवस्था आवश्यक है।
  • व्यक्तिगत अधिकारों एवं राज्य की संप्रभु शक्तियों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है।
  • विभिन्न राज्यों में प्रशासनिक क्षमता समान नहीं है।

आगे की राह

  • नागरिकता का निर्धारण विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाए।
  • जहाँ पर्याप्त एवं विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध हों, वहाँ केवल दस्तावेज़ों की कमी के आधार पर नागरिकता पर प्रश्न न उठाया जाए।
  • पारदर्शी एवं सुलभ शिकायत-निवारण तंत्र विकसित किया जाए।
  • जन्म पंजीकरण एवं डिजिटल पहचान प्रणाली को सुदृढ़ किया जाए तथा निजता की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा, संवैधानिक नैतिकता एवं मानव गरिमा के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) तथ्य

  • नागरिकता संबंधी प्रावधान – भाग II (अनुच्छेद 5–11)
  • अनुच्छेद 11 – संसद को नागरिकता संबंधी कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है।
  • नागरिकता अधिनियम, 1955 – नागरिकता संबंधी प्रमुख कानून।
  • अनुच्छेद 19 के अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं, जबकि अनुच्छेद 14 एवं 21 सभी व्यक्तियों पर लागू होते हैं।

मुख्य परीक्षा (Mains Enrichment)

“नागरिकता केवल दस्तावेज़ों का विषय नहीं है; यह गणराज्य में किसी व्यक्ति की समान सदस्यता की संवैधानिक मान्यता है। प्रशासनिक प्रक्रियाओं का उद्देश्य इस मान्यता को सुदृढ़ करना होना चाहिए, न कि उसे बाधित करना।”


Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *