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आर्थिक सर्वेक्षण के वादे, नए श्रम संहिताओं का प्रभाव

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )

विषय: जीएस पेपर 3 – भारतीय अर्थव्यवस्था (श्रम सुधार, रोजगार)

प्रस्तावना

भारत में श्रम सुधारों को चार श्रम संहिताओं में समेकित किया गया है, जिनका उद्देश्य नियमों को सरल बनाना, औपचारिककरण को बढ़ावा देना और श्रम बाज़ार की दक्षता को सुधारना है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 एक आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसके अनुसार ये सुधार औपचारिक रोजगार बढ़ा सकते हैं, महिला श्रम भागीदारी को प्रोत्साहित कर सकते हैं और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। हालांकि, भारत के श्रम बाज़ार की संरचनात्मक चुनौतियाँ यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या ये परिणाम वास्तव में प्राप्त हो पाएँगे।

I. नई श्रम संहिताओं के उद्देश्य

भारत ने 29 श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित किया है, जो हैं:

कोड ऑन वेजेस (2019)
औद्योगिक संबंध संहिता (2020)
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियाँ संहिता (2020)
सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020)

इन सुधारों के प्रमुख उद्देश्य हैं:

• व्यवसायों के लिए अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल बनाना
• रोजगार सृजन और निवेश को प्रोत्साहित करना
• सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार करना
• श्रम बाज़ार में लचीलापन बढ़ाना

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इन सुधारों से:

• औपचारिककरण 60.4% से बढ़कर 75.5% तक हो सकता है
• लगभग 77 लाख रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं
• बेरोज़गारी में कमी आ सकती है
• वर्ष 2029–30 तक जीडीपी में लगभग 1.25% की वृद्धि हो सकती है

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II. भारत के श्रम बाज़ार की संरचनात्मक वास्तविकता

सुधारों के बावजूद भारत का श्रम बाज़ार अभी भी अत्यधिक अनौपचारिक है।

मुख्य तथ्य:

• लगभग 80% श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं।
• अनौपचारिक श्रमिकों को रोजगार सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और श्रम अधिकारों की कमी होती है।
• कई कंपनियाँ अनुपालन लागत के कारण औपचारिक रोजगार से बचती हैं।

2011 से 2023 के बीच निम्न प्रवृत्तियाँ देखी गईं:

• स्थायी फैक्टरी नौकरियों में कमी
• ठेका और अस्थायी श्रमिकों की संख्या में वृद्धि
• संगठित क्षेत्र में रोजगार का संकुचन

इस प्रकार, संरचनात्मक अनौपचारिकता एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है।

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III. निश्चित अवधि रोजगार (Fixed-Term Employment) का विस्तार

श्रम सुधारों की एक महत्वपूर्ण विशेषता निश्चित अवधि रोजगार का विस्तार है।

इसके अंतर्गत कंपनियाँ स्थायी नियुक्ति के बजाय अल्पकालिक अनुबंध पर श्रमिकों को नियुक्त कर सकती हैं।

संभावित लाभ:

• नियोक्ताओं के लिए अधिक लचीलापन
• तेज़ भर्ती प्रक्रिया
• श्रमिकों को कुछ लाभ जैसे ग्रेच्युटी की पात्रता

हालांकि, कुछ चिंताएँ भी हैं:

• रोजगार सुरक्षा में कमी
• सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति में गिरावट
• अस्थिर रोजगार स्थितियों में वृद्धि

निश्चित अवधि के अनुबंध औपचारिक और अनौपचारिक रोजगार के बीच की रेखा को धुंधला कर सकते हैं।

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IV. श्रम विनियमन में परिवर्तन

नई श्रम संहिताओं में व्यापार संचालन को आसान बनाने के लिए कई नियामक परिवर्तन किए गए हैं।

उदाहरण:

• व्यावसायिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत कारखाने की परिभाषा की सीमा बढ़ाई गई है।
• औद्योगिक संबंध संहिता के अंतर्गत छंटनी के लिए सरकारी अनुमति की सीमा बढ़ाई गई है।
• ठेका श्रमिकों के लिए निर्धारित सीमा का विस्तार किया गया है।

हालांकि ये उपाय कंपनियों के लिए नियामक बोझ कम करते हैं, लेकिन इससे श्रमिकों की सुरक्षा भी कम हो सकती है।

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V. क्रियान्वयन से संबंधित मुद्दे

श्रम संहिताओं के कई पहलू अभी भी अस्पष्ट हैं।

  1. गिग श्रमिकों की सुरक्षा

प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों को गिग श्रमिकों के कल्याण के लिए अपने वार्षिक कारोबार का 1–2% योगदान देना होगा।

लेकिन कई मुद्दे अभी भी स्पष्ट नहीं हैं:

• लाभों की पात्रता
• कवरेज का दायरा
• दावों की प्रक्रिया

  1. पुनः कौशल निधि (Reskilling Fund)

नियोक्ताओं को छंटनी किए गए कर्मचारियों के लिए 15 दिनों के वेतन के बराबर राशि जमा करनी होगी।

हालांकि प्रशिक्षण कार्यक्रमों और निधि के उपयोग के बारे में स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है।

  1. न्यूनतम वेतन ढाँचा

कोड ऑन वेजेस राष्ट्रीय फ्लोर वेज और राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की अवधारणा प्रस्तुत करता है।

लेकिन:

• इन वेतनों के निर्धारण की पद्धति स्पष्ट नहीं है।
• प्रशासनिक विवेकाधिकार बढ़ने से असंगतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

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VI. श्रम प्रवर्तन की कमजोरी

सुधारों के तहत श्रम निरीक्षकों को “इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर” के रूप में पुनर्परिभाषित किया गया है।

हालांकि इसका उद्देश्य सहयोगात्मक अनुपालन को बढ़ावा देना है, आलोचकों का तर्क है कि:

• प्रवर्तन तंत्र कमजोर हो सकता है।
• नियोक्ता जुर्माना देकर गंभीर उल्लंघनों से बच सकते हैं।
• कई क्षेत्रों में श्रम न्यायालय और श्रमिक संघ पहले से ही कमजोर हैं।

इससे श्रम बाज़ार में जवाबदेही कम हो सकती है।

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VII. अनौपचारिकता के संरचनात्मक कारण

एक प्रमुख आलोचना यह है कि श्रम संहिताएँ अनौपचारिकता के मूल कारणों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करतीं।

अनौपचारिकता के बने रहने के कारण:

• कंपनियों के लिए कम श्रम लागत
• अनुपालन की लागत लाभों की तुलना में अधिक होना
• प्लेटफ़ॉर्म आधारित रोजगार का तेज़ विस्तार

यदि अनौपचारिक रोजगार सस्ता बना रहता है, तो औपचारिक नौकरियों को अधिक लचीला बनाने से स्वतः औपचारिककरण नहीं होगा।

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निष्कर्ष

भारत की श्रम संहिताएँ हाल के दशकों में किए गए सबसे महत्वपूर्ण श्रम बाज़ार सुधारों में से एक हैं। हालांकि आर्थिक सर्वेक्षण इनके माध्यम से औपचारिककरण और रोजगार सृजन की संभावनाओं को रेखांकित करता है, लेकिन व्यापक अनौपचारिकता और कमजोर प्रवर्तन जैसी संरचनात्मक चुनौतियाँ इनके प्रभाव को सीमित कर सकती हैं। प्रभावी क्रियान्वयन, श्रमिक सुरक्षा को मजबूत करना और अनौपचारिकता के मूल कारणों को संबोधित करना सार्थक श्रम सुधारों के लिए आवश्यक होगा।


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