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जलवायु परिवर्तन एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )

विषय : GS3 – पर्यावरण-स्वास्थ्य संबंध

प्रसंग

जलवायु परिवर्तन को भारत में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति के रूप में तेजी से पहचाना जा रहा है, क्योंकि बढ़ते तापमान, चरम मौसम घटनाएँ और प्रदूषण रोगों को बढ़ा रहे हैं, उनके प्रसार का विस्तार कर रहे हैं और स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव डाल रहे हैं।


मुख्य बिंदु

  • जलवायु परिवर्तन मौजूदा बीमारियों और स्वास्थ्य जोखिमों को बढ़ाता है
  • बाढ़ और सूखा जलजनित रोगों को बढ़ाते हैं
  • तापमान वृद्धि से डेंगू और मलेरिया जैसे वेक्टर जनित रोग फैलते हैं
  • वायु प्रदूषण श्वसन और हृदय रोगों को बढ़ाता है
  • हीट स्ट्रेस कमजोर वर्गों और शिशुओं को प्रभावित करता है

जलवायु परिवर्तन: एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट

  • यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि गंभीर स्वास्थ्य संकट है
  • यह मौजूदा बीमारियों को बढ़ाता है और नई स्वास्थ्य चुनौतियाँ उत्पन्न करता है
  • इसके प्रभाव दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों तक फैले हैं

जल संबंधी चरम स्थितियाँ और रोग भार

  • शहरी बाढ़ से हैजा और टाइफाइड जैसे रोग बढ़ते हैं
  • स्वच्छता प्रणाली पर दबाव से जल स्रोत दूषित होते हैं
  • सूखे क्षेत्रों में असुरक्षित जल उपयोग से डायरिया और निर्जलीकरण बढ़ता है

संक्रामक रोगों का विस्तार

  • बदलते जलवायु पैटर्न से डेंगू और मलेरिया जैसे रोग बढ़ रहे हैं
  • गर्म तापमान मच्छरों के प्रजनन क्षेत्र और अवधि बढ़ाता है
  • रोग नए क्षेत्रों में फैल रहे हैं जहाँ प्रतिरक्षा कम है

वायु प्रदूषण और बहु-अंग प्रभाव

  • ऊर्जा खपत बढ़ने से PM2.5 प्रदूषण बढ़ता है
  • फेफड़ों, हृदय और गुर्दों पर प्रभाव
  • प्रदूषण और गर्मी मिलकर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ाते हैं

हीट स्ट्रेस और संवेदनशील वर्ग

  • हीटवेव से हीट स्ट्रोक और हृदय संबंधी समस्याएँ
  • बाहरी श्रमिक और गरीब वर्ग अधिक प्रभावित
  • रात का तापमान बढ़ने से शरीर की पुनर्प्राप्ति कम होती है
  • समय से पहले जन्म और कम वजन वाले शिशुओं से संबंध

खाद्य सुरक्षा और पोषण प्रभाव

  • फसल उत्पादन प्रभावित होता है
  • कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ती है
  • दूध उत्पादन में कमी
  • कमजोर पोषण से रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखना आवश्यक है। स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करना, जलवायु-लचीला अवसंरचना विकसित करना, संसाधनों तक समान पहुँच सुनिश्चित करना और संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा करना अत्यंत आवश्यक है।


वर्णनात्मक प्रश्न (250 शब्द, 15 अंक)

प्रश्न: “जलवायु परिवर्तन भारत में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है।” जलवायु परिवर्तन के विभिन्न स्वास्थ्य प्रभावों की चर्चा कीजिए तथा एक जलवायु-लचीली स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण हेतु उपाय सुझाइए।

उत्तर:

परिचय:
जलवायु परिवर्तन आज केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है। भारत जैसे विकासशील देश में इसके प्रभाव अधिक व्यापक और जटिल हैं।

मुख्य भाग:

1. स्वास्थ्य पर प्रभाव

  • संक्रामक रोगों में वृद्धि: तापमान और वर्षा में बदलाव से डेंगू, मलेरिया जैसे रोग फैलते हैं।
  • जलजनित रोग: बाढ़ और जल संकट से हैजा, डायरिया बढ़ते हैं।
  • वायु प्रदूषण: श्वसन एवं हृदय रोगों में वृद्धि।
  • हीट स्ट्रेस: हीटवेव से मृत्यु दर बढ़ती है।
  • पोषण संकट: फसल उत्पादन प्रभावित होने से कुपोषण बढ़ता है।

2. स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रभाव

  • रोग भार में वृद्धि
  • अस्पतालों पर दबाव
  • संसाधनों की कमी

3. समाधान / उपाय

  • स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करना
  • जलवायु-लचीली योजनाएँ बनाना
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करना
  • स्वच्छ जल और स्वच्छता सुनिश्चित करना
  • वायु प्रदूषण नियंत्रण
  • संवेदनशील समूहों की सुरक्षा
  • जलवायु और स्वास्थ्य नीतियों का एकीकरण

निष्कर्ष:
जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य प्रभावों को कम करने के लिए समन्वित, दीर्घकालिक और समावेशी रणनीति आवश्यक है, जिससे एक सुदृढ़ और लचीली स्वास्थ्य प्रणाली विकसित की जा सके।


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