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ट्रांसजेंडर व्यक्ति (संशोधन) विधेयक — एक दोषपूर्ण समाधान

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )

Topic: जीएस पेपर 2 – सामाजिक न्याय (कमजोर वर्ग, लिंग अधिकार

परिचय

Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Bill, 2026 का उद्देश्य 2019 के अधिनियम में संशोधन कर ट्रांसजेंडर पहचान की परिभाषा और प्रमाणन व्यवस्था को पुनर्गठित करना है। यद्यपि यह विधेयक क्रियान्वयन संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए लाया गया है, फिर भी इसने अधिकारों, गरिमा और समावेशिता को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।

संशोधन के प्रमुख प्रावधान

1. संकीर्ण परिभाषा

  • ट्रांसजेंडर पहचान को हिजड़ा, किन्नर आदि विशिष्ट सामाजिक समूहों तक सीमित किया गया है।
  • इंटरसेक्स व्यक्तियों को भी इसी श्रेणी में शामिल किया गया है।

2. स्व-पहचान का अधिकार समाप्त

  • स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को समाप्त किया गया है।
  • इसके स्थान पर चिकित्सा प्राधिकरण द्वारा प्रमाणन की व्यवस्था की गई है।

3. संस्थागत नियंत्रण में वृद्धि

  • सर्जरी की अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधान।
  • नौकरशाही और चिकित्सा निगरानी को बढ़ाया गया है।

4. दंडात्मक प्रावधान

  • शोषण के मामलों में कठोर दंड (5–14 वर्ष कारावास) का प्रावधान।

प्रमुख चिंताएँ

1. गरिमा और स्वायत्तता का उल्लंघन

  • NALSA vs Union of India (2014) के स्व-पहचान सिद्धांत के विपरीत।
  • Article 21 (गरिमा और निजता) का उल्लंघन।

2. लिंग और जैविक लिंग का मिश्रण

  • इंटरसेक्स (जैविक) और ट्रांसजेंडर (पहचान आधारित) को एक ही श्रेणी में रखना।
  • इससे नीतिगत भ्रम और अपर्याप्त संरक्षण।

3. इंटरसेक्स अधिकारों की उपेक्षा

  • शिशुओं पर गैर-सहमति सर्जरी पर कोई प्रतिबंध नहीं।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का उल्लंघन।

4. पहचान का चिकित्साकरण

  • पहचान निर्धारण व्यक्ति से हटाकर चिकित्सा संस्थाओं को सौंपना।
  • इससे भेदभाव और नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ती है।

5. अंतर्विभाजकता (Intersectionality) की कमी

  • जाति, गरीबी, विकलांगता, धर्म जैसे कारकों की अनदेखी।
  • बहुस्तरीय असमानताओं को संबोधित नहीं किया गया।

6. कमजोर संस्थागत ढाँचा

  • राष्ट्रीय परिषद या राज्य बोर्ड में कोई सुधार नहीं।
  • कार्यान्वयन संबंधी समस्याएँ बनी रहती हैं।

7. नागरिक अधिकारों की अस्पष्टता

  • विवाह, गोद लेने, उत्तराधिकार जैसे अधिकारों पर स्पष्टता का अभाव।
  • पूर्ण नागरिकता अधिकार सीमित।

संवैधानिक एवं विधिक मुद्दे

  • Article 14 – विधि के समक्ष समानता
  • Article 15 – भेदभाव का निषेध
  • Article 21 – गरिमा और निजता का अधिकार

न्यायिक आधार

  • NALSA vs Union of India (2014) – स्व-पहचान की मान्यता
  • Justice K.S. Puttaswamy vs Union of India (2017) – निजता और स्वायत्तता की पुष्टि

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ

  • संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशानिर्देश

प्रभाव (Implications)

  • विषमलैंगिक (heteronormative) संरचनाओं को मजबूत करता है
  • कमजोर समुदायों का और अधिक हाशियाकरण
  • समावेशी विकास को कमजोर करता है
  • संवैधानिक नैतिकता के विपरीत

आगे की राह (Way Forward)

  • बिना चिकित्सा बाधाओं के स्व-पहचान अधिकार को पुनर्स्थापित करना
  • ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स व्यक्तियों के लिए अलग कानूनी ढाँचा
  • इंटरसेक्स शिशुओं पर गैर-सहमति सर्जरी पर प्रतिबंध
  • समुदाय की भागीदारी के साथ संस्थागत सुधार
  • विवाह, उत्तराधिकार आदि नागरिक अधिकारों की स्पष्टता
  • अंतर्विभाजक नीति निर्माण को अपनाना
  • डेटा संग्रह और अनुसंधान को मजबूत करना

निष्कर्ष

यह संशोधन विधेयक, अधिकारों को सशक्त बनाने के बजाय, पूर्व न्यायिक प्रगतिशीलता की भावना को कमजोर करने का जोखिम रखता है। एक अधिकार-आधारित, समावेशी और साक्ष्य-आधारित ढाँचा, जो गरिमा और समानता पर आधारित हो, ही लैंगिक विविध समुदायों के लिए वास्तविक न्याय सुनिश्चित कर सकता है।


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