The Hindu Editorial Analysis in Hindi
17 February 2026
ट्रान्साटलांटिक उपभेदों
(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )
विषयः जीएस 2: विकसित और विकासशील देशों की नीतियों और राजनीति का भारत के हितों पर प्रभाव, भारतीय प्रवासी
Context
यह मुद्दा म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में बढ़ते ट्रांसअटलांटिक तनाव के कारण चर्चा में है, जहाँ यूरोपीय नेताओं ने यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर प्रश्न उठाए।

मुख्य बिंदु
ट्रांसअटलांटिक संबंधों में तनाव बढ़ा
जर्मनी और फ्रांस ने अमेरिका की घटती सुरक्षा प्रतिबद्धता और वैचारिक मतभेदों के बीच यूरोप की अधिक सामरिक स्वायत्तता की आवश्यकता पर बल दिया।
अमेरिका की बदली हुई प्राथमिकताएँ
अमेरिका ने सहयोग का आश्वासन दिया, परंतु रणनीतिक प्राथमिकता के बजाय सांस्कृतिक-सभ्यतागत संबंधों पर अधिक जोर दिया।
यूक्रेन युद्ध की चुनौती
यूरोप द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और सैन्य सहायता के बावजूद निर्णायक परिणाम नहीं निकले, जिससे अस्थिरता लंबी खिंच रही है।
सुरक्षा निर्भरता की समस्या
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यूरोप अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर अत्यधिक निर्भर रहा है, जो अब टिकाऊ नहीं दिखती।
आंतरिक राजनीतिक दबाव
यूरोप में उग्र दक्षिणपंथी आंदोलनों का उभार और जन असंतोष यूरोपीय संघ की एकता और उदार लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती दे रहा है।
ट्रांसअटलांटिक तनाव और बदलते गठबंधन
जर्मनी की स्थिति
चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने कहा कि नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था प्रभावी रूप से कमजोर हो चुकी है। यह वैश्विक अस्थिरता को लेकर यूरोप की गहरी चिंता दर्शाता है।
फ्रांस की स्वायत्तता की मांग
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूरोप से अपनी सैन्य स्वायत्तता मजबूत करने का आह्वान किया। उनका मत है कि नाटो के भीतर यूरोप को अधिक स्वतंत्र और सशक्त स्तंभ बनना चाहिए।
अमेरिकी प्रतिक्रिया
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सहयोग जारी रखने का आश्वासन दिया, परंतु साझा इतिहास और सांस्कृतिक संबंधों पर अधिक बल दिया।
अंतर्निहित तनाव
यूरोप में अमेरिका की घटती सुरक्षा प्रतिबद्धता को लेकर चिंता स्पष्ट है। पहले उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस द्वारा यूरोप की लोकतांत्रिक प्रणाली और शरणार्थी नीतियों की आलोचना भी संबंधों में वैचारिक दूरी को दर्शाती है।
यूरोप के समक्ष तीन प्रमुख चुनौतियाँ
- यूक्रेन युद्ध
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यूरोप के पूर्वी क्षेत्र में यह सबसे बड़ा जमीनी संघर्ष है। हथियार आपूर्ति और रूस पर प्रतिबंधों के बावजूद निर्णायक समाधान नहीं निकला। - अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भरता
यूरोप की रक्षा व्यवस्था लंबे समय से अमेरिका पर निर्भर रही है। यदि अमेरिका अपनी प्राथमिकताएँ बदलता है, तो यह मॉडल अस्थिर हो सकता है। - आंतरिक उग्र दक्षिणपंथ का उभार
यूरोप में राष्ट्रवादी और उग्र दक्षिणपंथी दल यूरोपीय एकता और समावेशी लोकतंत्र की अवधारणा को चुनौती दे रहे हैं।
यूरोप के लिए आगे की राह
सामरिक स्वायत्तता का निर्माण
अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम कर स्वतंत्र सैन्य क्षमता विकसित करना।
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पुनर्निर्माण
पश्चिम से परे देशों के साथ सहयोग बढ़ाकर बहुपक्षीय स्थिरता को पुनर्जीवित करना।
यूक्रेन संघर्ष का समाधान
युद्ध समाप्त करने और रूस के साथ व्यवहार्य संबंध स्थापित करने के मार्ग तलाशना।
आंतरिक स्थिरता सुदृढ़ करना
लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास बहाल करना और चरमपंथी राजनीति का मुकाबला करना।
मार्गदर्शक सिद्धांत
यूरोप को प्राथमिकता देनी होगी:
महाद्वीपीय शांति और स्थिरता
वैश्विक सहयोग और संवाद
अधिक स्वतंत्र और लचीली भूमिका के साथ उभरती वैश्विक व्यवस्था में स्वयं को पुनर्परिभाषित करना
निष्कर्ष
यूरोप एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। युद्ध, आंतरिक राजनीतिक विभाजन और घटती अमेरिकी सुरक्षा गारंटी के बीच उसे सामरिक स्वायत्तता बढ़ानी होगी, साथ ही ट्रांसअटलांटिक सहयोग बनाए रखना होगा। व्यापक वैश्विक साझेदारियों और व्यावहारिक कूटनीति के माध्यम से ही वह स्थिरता, एकता और प्रासंगिकता सुनिश्चित कर सकता है।
वर्णनात्मक प्रश्न:
प्रश्न: ट्रांसअटलांटिक संबंधों में तनाव की पृष्ठभूमि में उभरती वैश्विक व्यवस्था के संदर्भ में यूरोप के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)