The Hindu Editorial Analysis in Hindi
19 March 2026
तकलीफ़ों का कोई अंत नहीं: भारत को अफ़ग़ानिस्तान पर पाकिस्तान की बमबारी के ख़िलाफ़ और ज़्यादा समर्थन जुटाना चाहिए।
(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )
Topic: जीएस पेपर 2 – अंतर्राष्ट्रीय संबंध (भारत का पड़ोस, सुरक्षा
प्रस्तावना
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ता हुआ संघर्ष, जो ड्यूरंड रेखा के आसपास सीमा-पार हवाई हमलों और हिंसा में वृद्धि से चिह्नित है, एक गंभीर मानवीय और सुरक्षा संकट का रूप ले चुका है। नागरिक अवसंरचना, विशेषकर चिकित्सा सुविधाओं के विनाश ने स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। भारत के लिए यह संघर्ष एक ओर रणनीतिक चुनौती प्रस्तुत करता है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय कूटनीति को पुनर्संतुलित करने का अवसर भी प्रदान करता है।

I. पाकिस्तान–अफगानिस्तान तनाव के कारण
यह संघर्ष लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों में निहित है।
- ड्यूरंड रेखा विवाद
• अफगानिस्तान ने ऐतिहासिक रूप से ड्यूरंड रेखा को वैध सीमा के रूप में स्वीकार नहीं किया है।
• इस विवादित सीमा पर बार-बार झड़पें होती रहती हैं।
- तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) मुद्दा
• पाकिस्तान अफगान तालिबान पर TTP आतंकियों को शरण देने का आरोप लगाता है।
• अफगानिस्तान इन आरोपों से इनकार करता है, जिससे अविश्वास बढ़ता है।
- सीमा-पार आतंकवाद
• पाकिस्तान के भीतर TTP के हमलों ने तनाव को और बढ़ाया है।
• इसके जवाब में पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के भीतर किए गए हमले संघर्ष को और तीव्र बनाते हैं।
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II. हालिया तनाव में वृद्धि
हाल की घटनाएँ संघर्ष में तीव्र वृद्धि को दर्शाती हैं:
• पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान में कथित आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले किए गए।
• नागरिक हताहत, जिनमें काबुल में एक पुनर्वास केंद्र का विनाश भी शामिल है, ने अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ाई है।
• अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर संप्रभुता के उल्लंघन और नागरिकों को निशाना बनाने का आरोप लगाया है।
इस प्रकार यह संघर्ष अब सीमित झड़पों से आगे बढ़कर एक निरंतर टकराव में परिवर्तित हो गया है।
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III. मानवीय परिणाम
इस संघर्ष के गंभीर मानवीय प्रभाव हैं:
• बड़े पैमाने पर नागरिक हताहत, जिनमें कमजोर वर्ग शामिल हैं।
• स्वास्थ्य अवसंरचना का विनाश।
• आजीविका में व्यवधान और लोगों का विस्थापन।
• महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की बढ़ती असुरक्षा।
अफगानिस्तान, जो पहले से ही आर्थिक और मानवीय संकट का सामना कर रहा है, इस संघर्ष से अधिक प्रभावित होगा।
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IV. भारत की स्थिति और सीमाएँ
भारत ने नागरिक ठिकानों पर हमलों की निंदा करते हुए स्पष्ट रुख अपनाया है।
हालांकि, उसकी भूमिका निम्न कारणों से सीमित है:
- प्रत्यक्ष कूटनीतिक चैनलों का अभाव
• भारत तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता नहीं देता।
• सीमित संपर्क के कारण प्रभाव सीमित रहता है।
- पाकिस्तान के साथ संवाद का अभाव
• द्विपक्षीय वार्ता न होने से कूटनीतिक विकल्प कम हो जाते हैं।
- रणनीतिक सीमाएँ
• भारत सीधे इस संघर्ष में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
• उसकी भूमिका मुख्यतः कूटनीतिक और मानवीय बनी रहती है।
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V. क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम
- संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका
• अमेरिका ने आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के संदर्भ में पाकिस्तान के कदमों का समर्थन किया है।
• इससे पाकिस्तान की सैन्य रणनीति को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- पश्चिम एशिया संघर्ष का प्रभाव
• ईरान–इज़राइल संघर्ष के कारण वैश्विक ध्यान बंट गया है।
• इससे दक्षिण एशिया में बढ़ते तनाव पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी कम हो सकती है।
- शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और क्षेत्रीय पक्ष
• SCO के सदस्य देशों की क्षेत्रीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका है।
• समन्वित क्षेत्रीय प्रयास तनाव कम करने में सहायक हो सकते हैं।
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VI. भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ
इस संघर्ष के भारत पर कई प्रभाव पड़ सकते हैं:
- सुरक्षा चिंताएँ
• अफगानिस्तान में अस्थिरता से आतंकवाद का खतरा बढ़ सकता है।
• इसके प्रभाव भारत की सुरक्षा पर पड़ सकते हैं।
- क्षेत्रीय स्थिरता
• लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष दक्षिण एशिया को अस्थिर कर सकता है।
• व्यापार और संपर्क परियोजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
- रणनीतिक अवसर
• पाकिस्तान का दो मोर्चों पर व्यस्त होना (अफगानिस्तान और भारत) उसकी रणनीतिक क्षमता को सीमित कर सकता है।
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VII. भारत के लिए आगे की रणनीति
भारत को संतुलित और सक्रिय नीति अपनानी चाहिए।
मुख्य कदम:
• नागरिकों को निशाना बनाने के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना।
• SCO जैसे क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से समाधान को बढ़ावा देना।
• अफगानिस्तान को मानवीय सहायता प्रदान करना।
• अपनी सीमाओं पर रणनीतिक सतर्कता बनाए रखना।
• व्यावहारिक सहयोग के लिए तालिबान के साथ सीमित कूटनीतिक संपर्क पर विचार करना।
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निष्कर्ष
पाकिस्तान–अफगानिस्तान संघर्ष सुरक्षा, मानवीय और भू-राजनीतिक चुनौतियों का एक जटिल मिश्रण प्रस्तुत करता है। भारत के लिए प्राथमिकता क्षेत्रीय अस्थिरता को रोकना और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना होना चाहिए। बहुपक्षीय मंचों का उपयोग और संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाकर भारत तनाव कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।