The Hindu Editorial Analysis in Hindi
20 February 2026
तेहरान फिर से ग्लोबल जियोपॉलिटिकल सुर्खियों में
(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )
विषय: जीएस पेपर 2 – अंतर्राष्ट्रीय संबंध
प्रसंग
ईरान एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति के केंद्र में आ गया है, क्योंकि उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव दोबारा बढ़ गया है। वर्ष 2015 के संयुक्त व्यापक कार्य योजना समझौते के 2018 में अमेरिका के बाहर होने के बाद विफल होने के पश्चात, वर्ष 2026 में कूटनीतिक प्रयास पुनः आरंभ हुए हैं, जबकि खाड़ी क्षेत्र में सैन्य तैनाती भी तेज हो रही है।
ईरान परमाणु मुद्दे की पुनरावृत्ति ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता की अपेक्षा अनिश्चितता अधिक दिखाई दे रही है।

संयुक्त व्यापक कार्य योजना की पृष्ठभूमि
वर्ष 2015 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी के समूह ने ईरान के साथ एक समझौता किया।
उद्देश्य थे:
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएँ लगाना।
निरीक्षण तंत्र स्थापित करना।
परमाणु हथियार निर्माण को रोकना, जबकि शांतिपूर्ण परमाणु उपयोग की अनुमति देना।
अनुपालन के बदले प्रतिबंधों में राहत प्रदान करना।
यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता लाने के उद्देश्य से एक बहुपक्षीय कूटनीतिक उपलब्धि माना गया।
ट्रम्प काल और नीति परिवर्तन
वर्ष 2018 में अमेरिका ने समझौते से बाहर निकलकर प्रतिबंध पुनः लागू कर दिए।
इसके परिणामस्वरूप:
ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाना पुनः आरंभ किया।
यूरोपीय सहयोगी कूटनीतिक रूप से सीमित हो गए।
वर्ष 2026 में:
अमेरिका ने क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है।
साथ ही, ईरान के साथ वार्ता भी जारी है, जिसमें ओमान की मध्यस्थता की चर्चा है।
संकेत हैं कि अमेरिका एक नए या संशोधित समझौते की ओर बढ़ रहा है।
सैन्य दबाव और कूटनीति का यह द्विपथीय दृष्टिकोण पूर्ववर्ती चक्रों की याद दिलाता है।
इज़राइल की भूमिका
इज़राइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा बताया है।
उसकी रणनीति में शामिल रहे हैं:
कठोर रुख अपनाने की वकालत।
सैन्य हमले और गुप्त अभियान।
अमेरिकी नीति-निर्माण पर प्रभाव।
अमेरिका–ईरान–इज़राइल का त्रिकोण पश्चिम एशिया की सुरक्षा गणनाओं में केंद्रीय बना हुआ है।
क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य और अरब देशों की चिंता
खाड़ी के अरब देशों ने:
अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों में निवेश किया है।
क्षेत्रीय युद्ध या दीर्घकालिक संघर्ष से परहेज़ की इच्छा व्यक्त की है।
वार्ता को प्राथमिकता दी है।
ईरान ने चेतावनी दी है कि किसी भी हमले की स्थिति में खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है।
क्षेत्र की संवेदनशीलता का कारण केवल ईरान की मंशा नहीं, बल्कि अमेरिकी निर्णय-प्रक्रिया की अनिश्चितता भी है।
ईरान की आंतरिक स्थिति
ईरान के भीतर:
लगातार विरोध प्रदर्शन।
प्रतिबंधों के कारण आर्थिक दबाव।
राजनीतिक ध्रुवीकरण और राष्ट्रवादी एकता का प्रयास।
आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियाँ उसकी वार्तात्मक रणनीति को प्रभावित करती हैं।
भारत के लिए महत्व
- ऊर्जा सुरक्षा
ईरान कभी भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में था।
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण तेल आयात में भारी कमी आई।
यदि समझौता पुनर्जीवित होता है तो ऊर्जा विविधीकरण के नए अवसर खुल सकते हैं।
- संपर्क परियोजनाएँ
चाबहार बंदरगाह भारत की महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना है।
यह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच प्रदान करता है।
यह चीन–पाकिस्तान गलियारे के संतुलन का साधन है।
प्रतिबंधों की अनिश्चितता परियोजना की निरंतरता को प्रभावित करती है।
- क्षेत्रीय संतुलन
ईरान के पाकिस्तान, अफगानिस्तान के तालिबान और मध्य एशियाई देशों के साथ संबंध भारत की सुरक्षा और रणनीतिक स्थिति को प्रभावित करते हैं।
रणनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न
भारत ने ऐतिहासिक रूप से परमाणु समझौते का समर्थन किया, क्योंकि:
यह स्थिरता का साधन था।
प्रतिबंधों में राहत का मार्ग था।
ऊर्जा और संपर्क परियोजनाओं के पुनरारंभ का अवसर था।
परंतु पूर्व में अमेरिकी दबाव के कारण भारत को तेल आयात कम करना पड़ा, जिससे वाशिंगटन के साथ साझेदारी और स्वतंत्र पश्चिम एशिया नीति के बीच संतुलन की चुनौती स्पष्ट हुई।
वर्तमान स्थिति भारत की बहु-संरेखण नीति, कूटनीतिक संतुलन क्षमता और ऊर्जा रणनीति की परीक्षा लेती है।
वैश्विक प्रभाव
ईरान परमाणु प्रश्न व्यापक वैश्विक प्रवृत्तियों को दर्शाता है:
बहुपक्षीय समझौतों का विखंडन।
एकतरफा प्रतिबंधों का बढ़ता उपयोग।
कूटनीति के साथ सैन्यीकरण का समांतर चलना।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पूर्वानुमेयता का क्षरण।
निष्कर्ष
ईरान का पुनः वैश्विक केंद्र में आना पश्चिम एशिया की अस्थिरता और पूर्व कूटनीतिक व्यवस्थाओं की सीमाओं को रेखांकित करता है। चाहे समझौते का पुनर्जीवन हो या टकराव की पुनरावृत्ति, अमेरिका–ईरान संबंधों की दिशा क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा को प्रभावित करेगी।
भारत के लिए प्राथमिकता है:
ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा।
चाबहार जैसी रणनीतिक परियोजनाओं की निरंतरता।
प्रतिस्पर्धी शक्तियों के बीच संतुलित कूटनीति।
अस्थिर क्षेत्रीय परिदृश्य में, निरंतर कूटनीति और संतुलित दृष्टिकोण ही भारत और पश्चिम एशिया दोनों के दीर्घकालिक हितों के अनुकूल हैं।