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पड़ोस कूटनीति और उसकी पश्चिम एशिया चुनौती

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )

Topic: जीएस पेपर 2 – अंतर्राष्ट्रीय संबंध (पड़ोस नीति, पश्चिम एशिया)

प्रस्तावना

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, जिसमें ईरान, इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव शामिल हैं, अब सीधे दक्षिण एशिया को प्रभावित करने लगा है। हिंद महासागर में ईरानी परिसंपत्तियों पर हमलों जैसी घटनाओं के साथ यह संकट अब भौगोलिक रूप से दूर नहीं रह गया है। भारत के लिए, जिसके इस क्षेत्र के साथ गहरे आर्थिक, रणनीतिक और प्रवासी संबंध हैं, यह संघर्ष उसकी पड़ोस कूटनीति और क्षेत्रीय नेतृत्व के लिए एक गंभीर परीक्षा प्रस्तुत करता है।

I. दक्षिण एशिया पर प्रभाव

यह संघर्ष कई प्रकार से दक्षिण एशिया को प्रभावित कर रहा है:

• व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान, जिसमें ईंधन, खाद्य और उर्वरक शामिल हैं।
• समुद्री सुरक्षा के लिए जोखिम, विशेषकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास।
• प्रवासी समुदाय की सुरक्षा पर खतरा, क्योंकि लगभग 2.5 करोड़ दक्षिण एशियाई पश्चिम एशिया में रहते हैं।
• भारतीय नाविक, जो वैश्विक समुद्री कर्मियों का एक बड़ा हिस्सा हैं, विशेष रूप से संवेदनशील हैं।

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II. भारत की कूटनीतिक प्रतिक्रिया: चिंताएँ

संकट के प्रति भारत की प्रारंभिक प्रतिक्रिया ने उसकी कूटनीतिक स्थिति को लेकर कुछ चिंताएँ उत्पन्न की हैं।

मुख्य बिंदु:

• संतुलित बयान देने और संवेदना व्यक्त करने में देरी।
• संघर्ष के शुरुआती चरण में एक पक्ष के साथ झुकाव की धारणा।
• बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों की प्रतिक्रियाओं से तुलना।

इससे भारत की पारंपरिक संतुलित पश्चिम एशिया नीति से विचलन की छवि बनी है।

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III. भारत की पारंपरिक पश्चिम एशिया नीति

भारत ने ऐतिहासिक रूप से पश्चिम एशिया में बहु-संरेखण (multi-alignment) की नीति अपनाई है:

• इज़राइल के साथ मजबूत संबंध (रक्षा और प्रौद्योगिकी)
• ईरान के साथ सहयोग (ऊर्जा और चाबहार जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाएँ)
• खाड़ी देशों के साथ साझेदारी (व्यापार, प्रवासी और ऊर्जा)

इस नीति ने भारत को प्रतिस्पर्धी क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायता दी है।

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IV. समुद्री और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ

यह संघर्ष समुद्री सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है।

  1. हिंद महासागर की संवेदनशीलता

• होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक चोकपॉइंट खतरे में हैं।
• हिंद महासागर क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों में वृद्धि।

  1. सुरक्षा छवि का कमजोर होना

• हिंद महासागर में बाहरी शक्तियों द्वारा ईरानी नौसैनिक परिसंपत्तियों को नष्ट करना भारत की “नेट सुरक्षा प्रदाता” की छवि को चुनौती देता है।

  1. क्षेत्रीय समन्वय की आवश्यकता

भारत को निम्नलिखित मंचों के माध्यम से सहयोग बढ़ाना चाहिए:

• हिंद महासागर रिम संघ (IORA)
• कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन
• सूचना संलयन केंद्र – हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR)

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V. आर्थिक और ऊर्जा प्रभाव

यह संघर्ष भारत और उसके पड़ोसी देशों पर व्यापक आर्थिक प्रभाव डाल सकता है।

  1. ऊर्जा सुरक्षा

• पश्चिम एशियाई तेल पर भारत की निर्भरता इसे आपूर्ति व्यवधान के प्रति संवेदनशील बनाती है।
• ऊर्जा कीमतों में वृद्धि से महंगाई और आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है।

  1. क्षेत्रीय आर्थिक दबाव

पड़ोसी देश जैसे:

• बांग्लादेश
• श्रीलंका
• नेपाल
• मालदीव

ईंधन संकट और आर्थिक अस्थिरता का सामना कर सकते हैं, जिससे उनकी भारत पर निर्भरता बढ़ सकती है।

  1. पूर्व संकटों से सीख

• कोविड-19 संकट ने “संपूर्ण क्षेत्र” दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित किया, जैसा कि वैक्सीन मैत्री पहल में देखा गया।

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VI. भू-राजनीतिक सीमाएँ

भारत की विदेश नीति अब वैश्विक संरेखणों से प्रभावित हो रही है।

मुख्य चुनौतियाँ:

• क्वाड जैसे समूहों में भागीदारी, जिससे पक्षपात की धारणा बन सकती है।
• अमेरिका जैसे प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना।
• पश्चिम एशिया में प्रतिस्पर्धी शक्तियों के बीच संतुलन बनाना।

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VII. रणनीतिक संतुलन पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता

भारत को अपनी विश्वसनीयता और नेतृत्व बनाए रखने के लिए अपनी कूटनीति को पुनः संतुलित करना होगा।

मुख्य कदम:

• पश्चिम एशिया में संतुलित और निष्पक्ष रुख को पुनः स्थापित करना।
• हिंद महासागर क्षेत्र में क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना।
• पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक और ऊर्जा सहयोग बढ़ाना।
• दक्षिण एशिया में कनेक्टिविटी और व्यापार प्लेटफॉर्म को बढ़ावा देना।
• ब्रिक्स और क्वाड जैसे मंचों का उपयोग क्षेत्रीय स्थिरता के लिए करना।

भारत की पारंपरिक नीति, जिसमें प्रतिद्वंद्वी समूहों से समान दूरी बनाए रखना शामिल है, आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

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निष्कर्ष

पश्चिम एशिया का संघर्ष भारत की पड़ोस कूटनीति के लिए एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है। जैसे-जैसे भू-राजनीतिक तनाव दक्षिण एशिया तक फैल रहे हैं, भारत को अपने आर्थिक, रणनीतिक और मानवीय हितों की रक्षा करते हुए संतुलन बनाए रखना होगा। एक संतुलित, सक्रिय और सुविचारित विदेश नीति ही भारत को क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने में सक्षम बनाएगी।


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