The Hindu Editorial in Hindi
08 July 2026
पश्चिम एशियाई संकट के बाद भारत की आर्थिक संभावनाएं
(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)
Topic: GS-3: भारतीय अर्थव्यवस्था | विकास और प्रगति | ऊर्जा सुरक्षा | बाहरी क्षेत्र | महंगाई
संदर्भ
पश्चिम एशिया संकट के शांत होने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पुनः खुलने के बाद वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति के स्थिर होने की संभावना है।
तेल की कीमतों में कमी भारत के लिए आर्थिक वृद्धि को गति देने, राजकोषीय स्थिति को मजबूत करने तथा दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करती है।
मुख्य मुद्दा
- पश्चिम एशिया में हालिया संघर्ष के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति अस्थायी रूप से बाधित हुई तथा वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि हुई।
- भारत अपनी लगभग 90% कच्चे तेल की आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है।
- इसलिए दीर्घकालिक भू-राजनीतिक अस्थिरता का सीधा प्रभाव निम्नलिखित पर पड़ता है—
- मुद्रास्फीति
- राजकोषीय घाटा
- चालू खाता घाटा (CAD)
- आर्थिक विकास
प्रमुख घटनाक्रम
कच्चे तेल की कीमतें (भारतीय क्रूड बास्केट)
- अप्रैल 2026 : 114.5 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल
- मई 2026 : 106.2 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल
- 24 जून 2026 : 86.3 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल
आर्थिक वृद्धि का अनुमान
- NSO के अनुसार 2025–26 में GDP वृद्धि : 7.7%
- RBI का 2026–27 के लिए GDP वृद्धि अनुमान : 6.6%
स्थैतिक पृष्ठभूमि
होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)
- फारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) से जोड़ता है।
- विश्व के लगभग पाँचवें भाग के कच्चे तेल के व्यापार का परिवहन इसी मार्ग से होता है।
- भारत के ऊर्जा आयात के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।
भारतीय क्रूड बास्केट (Indian Crude Basket)
- भारत द्वारा आयातित विभिन्न प्रकार के कच्चे तेल की भारित औसत (Weighted Average) कीमत।
- इसका प्रकाशन पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (Petroleum Planning & Analysis Cell – PPAC) द्वारा किया जाता है।
प्रमुख आयाम
आर्थिक वृद्धि की संभावनाएँ
- कच्चे तेल की कीमतों में कमी से आयातित मुद्रास्फीति घटती है।
- परिवहन एवं विनिर्माण लागत कम होती है।
- लोगों की क्रय शक्ति (Disposable Income) बढ़ती है।
- उपभोग (Consumption) में वृद्धि होती है।
- कॉरपोरेट लाभप्रदता बेहतर होती है।
राजकोषीय स्थिति
- सब्सिडी का बोझ कम होता है।
- उच्च नाममात्र GDP के कारण कर संग्रह बढ़ सकता है।
- RBI का लाभांश सरकार की वित्तीय स्थिति को मजबूत करता है।
- राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
बाह्य क्षेत्र (External Sector)
- कच्चे तेल के आयात बिल में कमी आती है।
- चालू खाता घाटा (CAD) घटता है।
- विदेशी मुद्रा भंडार एवं विनिमय दर की स्थिरता मजबूत होती है।
- समष्टि आर्थिक (Macroeconomic) स्थिरता में सुधार होता है।
कृषि क्षेत्र
- उर्वरकों की उपलब्धता बेहतर होती है।
- किसानों की उत्पादन लागत घटती है।
- हालांकि, एल नीनो (El Niño) के कारण मानसून की अनिश्चितता अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।
भारत की पेट्रोलियम अर्थव्यवस्था
प्रमुख संरचनात्मक विशेषताएँ
- कच्चे तेल पर आयात निर्भरता 1998–99 के लगभग 55% से बढ़कर 2025–26 में लगभग 90% हो गई है।
- घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन लगातार घट रहा है।
- पेट्रोलियम उत्पादों की खपत में निरंतर वृद्धि हुई है।
- भारत विश्व की प्रमुख तेल शोधन (Refining) क्षमताओं में शामिल है।
- ऊर्जा दक्षता बढ़ने से GDP की ऊर्जा तीव्रता (Energy Intensity) में धीरे-धीरे कमी आई है।
अवसर
- स्थिर तेल कीमतों से सतत आर्थिक विकास को बल मिलेगा।
- बेहतर राजकोषीय प्रबंधन संभव होगा।
- मुद्रास्फीति नियंत्रित रहेगी।
- बाह्य क्षेत्र की स्थिति मजबूत होगी।
- निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
चुनौतियाँ
- आयातित कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भरता।
- भू-राजनीतिक संकटों के प्रति संवेदनशीलता।
- मानसून एवं एल नीनो से जुड़ी कृषि संबंधी अनिश्चितताएँ।
- उर्वरक आयात पर निर्भरता।
- वैश्विक वस्तु (Commodity) कीमतों में उतार-चढ़ाव।
आगे की राह
ऊर्जा सुरक्षा
- कच्चे तेल के आयात स्रोतों का विविधीकरण किया जाए।
- सामरिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve – SPR) का विस्तार किया जाए।
- घरेलू तेल एवं गैस अन्वेषण को बढ़ावा दिया जाए।
- नवीकरणीय ऊर्जा एवं परमाणु ऊर्जा का विस्तार किया जाए।
आर्थिक नीति
- आवश्यक वस्तुओं के रणनीतिक भंडार विकसित किए जाएँ।
- आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) को अधिक लचीला बनाया जाए।
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम की जाए।
- विकास को प्रोत्साहित करते हुए राजकोषीय अनुशासन बनाए रखा जाए।
कृषि क्षेत्र
- उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
- आवश्यकता पड़ने पर फसल-विशिष्ट आयात नीति की समीक्षा की जाए।
- जलवायु-सहिष्णु (Climate-Resilient) कृषि को बढ़ावा दिया जाए।
समालोचनात्मक विश्लेषण
सकारात्मक पक्ष
- तेल की कीमतों में गिरावट से समष्टि आर्थिक स्थिरता मजबूत होती है।
- भारत की विशाल रिफाइनिंग क्षमता ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करती है।
- ऊर्जा तीव्रता में कमी दीर्घकालिक सतत विकास के लिए अनुकूल है।
- अतिरिक्त राजकोषीय संसाधनों का उपयोग उत्पादक सार्वजनिक निवेश में किया जा सकता है।
सीमाएँ
- पश्चिम एशिया में स्थायी शांति अभी भी अनिश्चित है।
- आयातित कच्चे तेल पर संरचनात्मक निर्भरता बनी हुई है।
- घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन लगातार घट रहा है।
- स्वच्छ एवं वैकल्पिक ऊर्जा की ओर दीर्घकालिक संक्रमण अभी अधूरा है।