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भारत और ऑस्ट्रेलिया – व्यापार और विश्वास की बाधाओं को दूर करना

(Source – The Hindu, International Edition – Page No. – 8)

विषय: जीएस-2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध), जीएस-3 (अर्थव्यवस्था – व्यापार समझौते, कृषि)

Context

संपादकीय भारत–ऑस्ट्रेलिया के बीच प्रस्तावित व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (Comprehensive Economic Cooperation Agreement – CECA) की संभावनाओं का विश्लेषण करता है, जो पहले हुए आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते (Economic Cooperation and Trade Agreement – ECTA) पर आधारित होगा।

लेख का तर्क है कि वास्तविक चुनौती केवल शुल्क (टैरिफ) कम करने की नहीं, बल्कि व्यापारिक पहुँच, कृषि संवेदनशीलताओं और दीर्घकालिक रणनीतिक विश्वास के बीच संतुलन स्थापित करने की है।

Core Issue

मुख्य प्रश्न:

क्या भारत और ऑस्ट्रेलिया ऐसा व्यापारिक समझौता बना सकते हैं जो व्यापार विस्तार के साथ-साथ घरेलू कृषि हितों और रणनीतिक विश्वास की रक्षा भी कर सके?

मुख्य चिंताएँ:

• व्यापारिक पहुँच और घरेलू हितों में संतुलन
• कृषि संवेदनशीलताओं की सुरक्षा
• दीर्घकालिक रणनीतिक विश्वास निर्माण


पृष्ठभूमि

भारत–ऑस्ट्रेलिया आर्थिक संबंध निम्न कारणों से मजबूत हुए:

• ECTA (2022)
• क्वाड सहयोग
• आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) विविधीकरण
• वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवधान

ECTA की प्रमुख उपलब्धियाँ:

• ऑस्ट्रेलिया ने भारत को लगभग 100% बाजार पहुँच प्रदान की
• भारत ने लगभग 70% बाजार पहुँच पर टैरिफ रियायतें दीं
• लगभग 91% द्विपक्षीय व्यापार समझौते के अंतर्गत आया

अब प्रस्तावित CECA का उद्देश्य अधिक गहन आर्थिक एकीकरण है।


भारत तेजी से व्यापार समझौते क्यों कर रहा है

हाल के वर्षों में भारत ने तेजी से समझौते किए:

• UAE
• यूनाइटेड किंगडम
• यूरोपीय संघ
• न्यूजीलैंड
• ऑस्ट्रेलिया

कारण:

• वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की अनिश्चितता
• बढ़ता संरक्षणवाद
• टैरिफ युद्ध और आर्थिक विखंडन
• निवेश प्रवाह की आवश्यकता
• निर्यात बाजारों का विविधीकरण

अवलोकन:

पश्चिम एशिया के संकट और बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने भारत को तेज व्यापार कूटनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया।


मौजूदा भारत–ऑस्ट्रेलिया व्यापार असंतुलन

ECTA के बाद:

• व्यापार लगभग दोगुना हुआ
• लगभग 12 अरब डॉलर से बढ़कर 24 अरब डॉलर से अधिक पहुँचा

फिर भी लाभ असमान रहे:

• ऑस्ट्रेलियाई निर्यात का अधिक प्रभुत्व
• शिक्षा सेवाओं में ऑस्ट्रेलिया की मजबूत स्थिति

निवेश असमानता:

• ऑस्ट्रेलिया में भारतीय निवेश > भारत में ऑस्ट्रेलियाई निवेश

निष्कर्ष:

सिर्फ बाजार पहुँच संतुलित लाभ सुनिश्चित नहीं करती।


मुख्य चुनौती: कृषि

भारत:

• औसत भूमि जोत लगभग 0.73 हेक्टेयर
• आधी से अधिक आबादी की आजीविका का आधार
• खाद्य सुरक्षा से जुड़ा क्षेत्र

ऑस्ट्रेलिया:

• औसत भूमि जोत लगभग 1,400 हेक्टेयर
• अत्यधिक यंत्रीकृत कृषि
• निर्यात आधारित मॉडल

सरल तुलना:

भारतीय कृषि → आजीविका मॉडल

ऑस्ट्रेलियाई कृषि → औद्योगिक निर्यात मॉडल

निष्कर्ष:

दोनों की संरचना अलग होने के कारण “समान अवसर” व्यावहारिक नहीं।


भारत की प्रमुख चिंताएँ

भारत को आशंका:

• सस्ते कृषि आयात
• घरेलू किसानों पर दबाव
• संवेदनशील क्षेत्रों को नुकसान

विशेष चिंता वाले क्षेत्र:

• डेयरी
• गेहूँ
• चावल
• चीनी
• चना

इसलिए भारत संरक्षण की मांग करता है।


प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर

संपादकीय का मुख्य तर्क:

कृषि को “शून्य-योग खेल” (Zero-Sum Game) की तरह नहीं देखना चाहिए, बल्कि सहयोग आधारित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया निम्न क्षेत्रों में सहायता दे सकता है:

• सटीक कृषि (Precision Farming)
• जल प्रबंधन
• जलवायु अनुकूलन तकनीक
• कोल्ड-चेन नेटवर्क
• सूखा प्रबंधन

संभावित सहयोग:

• भंडारण अवसंरचना
• लॉजिस्टिक्स नेटवर्क
• कृषि तकनीक
• एग्री-स्टार्टअप
• निवेश


सहयोग के उदाहरण

भारत–ऑस्ट्रेलिया स्मार्ट फार्म नेटवर्क पहल

संभावित क्षेत्र:

• विश्वविद्यालय सहयोग
• कृषि नवाचार
• स्थानीय साझेदारी


व्यापक रणनीतिक महत्व

भारत–ऑस्ट्रेलिया साझेदारी केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि:

• इंडो-पैसिफिक रणनीति
• आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन
• क्वाड सहयोग
• चीन पर निर्भरता कम करना

अर्थात:

व्यापार अब एक रणनीतिक उपकरण भी बन चुका है।


UPSC Value Addition

चुनौतियाँ:

• कृषि संवेदनशीलता
• व्यापार असंतुलन
• विश्वास की कमी
• बाजार पहुँच असमानता
• निवेश अंतर

अवसर:

• कृषि-तकनीकी सहयोग
• शिक्षा साझेदारी
• आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन
• स्वच्छ ऊर्जा
• महत्वपूर्ण खनिज
• डिजिटल अर्थव्यवस्था


निष्कर्ष

संपादकीय का तर्क है कि भारत–ऑस्ट्रेलिया संबंधों को केवल टैरिफ वार्ता से आगे बढ़ाकर गहरे रणनीतिक और संस्थागत विश्वास की दिशा में ले जाना चाहिए।

सफल CECA केवल समान बाजार पहुँच पर आधारित नहीं हो सकता; उसे पूरकता और पारस्परिक विश्वास पर आधारित होना होगा।

स्मरणीय पंक्ति:

“व्यापार समझौते तब सफल होते हैं जब साझेदार समानता नहीं, बल्कि परस्पर पूरकता खोजते हैं।”


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