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भारत का पश्चिम एशिया के साथ नया तालमेल: कसूरवार से ज़्यादा पीड़ित

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )

Topic: जीएस पेपर 2 – अंतर्राष्ट्रीय संबंध (पश्चिम एशिया, विदेश नीति

प्रस्तावना

भारत की पश्चिम एशिया नीति में पिछले एक दशक में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है, जिसमें खाड़ी देशों, इज़राइल और ईरान के साथ गहरे संबंध स्थापित किए गए हैं। क्षेत्र में हालिया भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत की नीतियों की समीक्षा की जा रही है। हालांकि, गहन विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत का दृष्टिकोण रणनीतिक त्रुटियों के बजाय बदलते क्षेत्रीय परिदृश्य के प्रति व्यावहारिक अनुकूलन को दर्शाता है।

I. भारत की पश्चिम एशिया नीति का विकास

हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया के साथ भारत की सहभागिता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

मुख्य विकास:

• खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों के साथ उच्च स्तरीय कूटनीतिक यात्राओं में वृद्धि
• इज़राइल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ समानांतर रूप से संबंधों को मजबूत करना
• यूएई और ओमान जैसे देशों के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) का विस्तार
• व्यापार में वृद्धि (160 अरब डॉलर से अधिक) और मजबूत प्रवासी उपस्थिति

भारत ने ‘डी-हाइफनेशन’ की नीति अपनाई है, जिसके तहत क्षेत्रीय देशों के साथ संबंधों को स्वतंत्र रूप से विकसित किया जाता है, न कि द्विआधारी दृष्टिकोण से।

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II. पश्चिम एशिया में बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य

क्षेत्रीय परिदृश्य में बड़े परिवर्तन हो रहे हैं।

मुख्य प्रवृत्तियाँ:

• अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था (Pax Americana) का कमजोर होना
• ईरान और तुर्किये जैसे देशों की बढ़ती क्षेत्रीय सक्रियता
• गाजा और ईरान से जुड़े संघर्षों के कारण अस्थिरता में वृद्धि
• खाड़ी देशों द्वारा विविध सुरक्षा साझेदारियों की खोज

इन परिवर्तनों ने भारत सहित कई देशों को अपनी रणनीतियों को पुनः संतुलित करने के लिए प्रेरित किया है।

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III. भारत का हालिया कूटनीतिक पुनर्संतुलन

भारत की नीति में बदलाव नए भू-राजनीतिक यथार्थ के अनुरूप है।

मुख्य विशेषताएँ:

• खाड़ी देशों की स्थिरता और सुरक्षा चिंताओं का समर्थन
• तनावों के बावजूद ईरान के साथ संवाद बनाए रखना
• विवादास्पद मुद्दों पर अनावश्यक सार्वजनिक रुख से बचना
• विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन

यह दृष्टिकोण भारत के एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के रूप में बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाता है।

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IV. भारत की नीति की आलोचना

व्यावहारिक दृष्टिकोण के बावजूद भारत की नीति की आलोचना भी हुई है।

मुख्य चिंताएँ:

• संघर्ष के दौरान उच्च स्तरीय यात्राओं के समय को लेकर प्रश्न
• फिलिस्तीन और ईरान के प्रति समर्थन में कमी की धारणा
• पश्चिमी देशों के साथ संभावित झुकाव को लेकर चिंता
• अस्थिर क्षेत्रीय परिस्थितियों में रणनीतिक अति-विस्तार का जोखिम

हालांकि, ये आलोचनाएँ बहुस्तरीय संबंधों के संतुलन की जटिलता को अक्सर नजरअंदाज करती हैं।

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V. अन्य वैश्विक शक्तियों की स्थिति

भारत की नीति को व्यापक वैश्विक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

• चीन ने रणनीतिक बयानबाजी के बावजूद ईरान के तेल पर निर्भरता कम की है
• रूस ईरान के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह निभाने में सफल नहीं रहा है
• पाकिस्तान ने राजनीतिक बयानबाजी के बावजूद सीमित सक्रियता दिखाई है
• कई अरब देशों ने संघर्षों के दौरान सावधानीपूर्ण मौन बनाए रखा है

इस प्रकार, भारत की नीति कोई अपवाद नहीं है, बल्कि व्यावहारिक कूटनीति के व्यापक रुझान का हिस्सा है।

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VI. भारत के लिए रणनीतिक अवसर

पश्चिम एशिया की बदलती स्थिति भारत के लिए कई अवसर प्रदान करती है।

  1. ऊर्जा और आर्थिक सहयोग

• खाड़ी देश अमेरिका से परे साझेदारियों को विविध बना सकते हैं
• भारत एक विश्वसनीय आर्थिक साझेदार के रूप में उभर सकता है

  1. आपूर्ति शृंखला विविधीकरण

• वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान भारत के लिए व्यापार और निवेश विस्तार का अवसर प्रदान करते हैं

  1. रणनीतिक स्थिति

• भारत एक निष्पक्ष और विश्वसनीय भागीदार के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है

  1. GCC+ रणनीति

भारत निम्न क्षेत्रों में खाड़ी देशों के साथ सहयोग बढ़ा सकता है:

• व्यापार एकीकरण
• निवेश साझेदारी
• सुरक्षा सहयोग

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VII. संतुलित कूटनीति की आवश्यकता

भारत को अपनी पश्चिम एशिया नीति में संतुलन बनाए रखना होगा।

मुख्य सिद्धांत:

• रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना
• किसी एक गुट के साथ कठोर संरेखण से बचना
• सभी क्षेत्रीय पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना
• निरंतरता और लचीलापन का संतुलन

कूटनीति में यह सिद्धांत महत्वपूर्ण है कि देशों के स्थायी हित होते हैं, स्थायी मित्र नहीं।

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निष्कर्ष

भारत की पश्चिम एशिया नीति तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के प्रति एक व्यावहारिक प्रतिक्रिया को दर्शाती है। यद्यपि आलोचनाएँ मौजूद हैं, वे अक्सर बहु-स्तरीय रणनीतिक संबंधों के प्रबंधन की जटिलता को कम करके आंकती हैं। संतुलन, लचीलापन और राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित दृष्टिकोण के माध्यम से भारत क्षेत्रीय अनिश्चितताओं का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है और पश्चिम एशिया में एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को सुदृढ़ कर सकता है।


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