The Hindu Editorial Analysis in Hindi
08 January 2026
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(Source – The Hindu, International Edition – Page No. – 8)
Topic : जीएस पेपर – जीएस-3 : स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति, शासन
प्रसंग
- यह संपादकीय दिसंबर 2025 के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री द्वारा एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध पर दिए गए वक्तव्य का विश्लेषण करता है।
- प्रधानमंत्री ने एंटीबायोटिक दवाओं के अविवेकपूर्ण और अनियंत्रित उपयोग को एक राष्ट्रीय चिंता के रूप में रेखांकित किया।
- इस विषय को तकनीकी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या से निकालकर जन-जागरूकता के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया गया।
- भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के आँकड़ों के आधार पर सामान्य संक्रमणों में एंटीबायोटिक की घटती प्रभावशीलता को उजागर किया गया।
- नागरिकों से स्वयं दवा लेने से बचने का आह्वान किया गया।
- संपादकीय इसे एक महत्वपूर्ण संकेत मानता है, जिसे अब ठोस नीतिगत कार्रवाई से जोड़ना आवश्यक है।

मुख्य मुद्दा
- केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या केवल जन-जागरूकता भारत में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की समस्या को नियंत्रित कर सकती है।
- या फिर इसके लिए गहन निगरानी व्यवस्था, सख्त नियामक ढाँचे और संस्थागत सुधार आवश्यक हैं।
- व्यवहार परिवर्तन आवश्यक है, लेकिन समस्या अब बहु-क्षेत्रीय और जटिल रूप ले चुकी है।
- इसके समाधान के लिए निम्न की आवश्यकता है:
- मज़बूत आँकड़ा प्रणालियाँ
- स्वास्थ्य तंत्र का सुदृढ़ीकरण
- नियामक प्रवर्तन
- ‘वन हेल्थ’ आधारित समन्वित दृष्टिकोण
जन-सरोकार के रूप में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध
- लंबे समय तक यह विषय सीमित रहा:
- चिकित्सा पत्रिकाओं तक
- अस्पतालों के भीतर
- नीतिगत दस्तावेज़ों तक
- प्रधानमंत्री के वक्तव्य ने:
- इस मुद्दे को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।
- व्यक्तिगत व्यवहार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संबंध स्पष्ट किया।
- यह संदेश दिया कि एंटीबायोटिक सामान्य दवाएँ नहीं, बल्कि नियंत्रित चिकित्सकीय साधन हैं।
- पूर्व प्रयासों में राष्ट्रीय कार्ययोजना और कुछ दवाओं पर प्रतिबंध तभी प्रभावी हुए जब नीति और जागरूकता साथ-साथ चले।
केवल जागरूकता की सीमाएँ
- भारत में इस समस्या की वर्तमान स्थिति में केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है।
- यह समस्या बहु-मुखी बन चुकी है।
- मनुष्य, पशु, कृषि और पर्यावरण सभी में प्रतिरोध विकसित हो रहा है।
- इसके समाधान के लिए सभी क्षेत्रों को जोड़ने वाला दृष्टिकोण आवश्यक है।
- संरचनात्मक सुधारों के बिना जन-संदेश केवल प्रतीकात्मक बनकर रह सकता है।
निगरानी व्यवस्था में कमियाँ
- एक बड़ी कमजोरी निगरानी प्रणाली की सीमित पहुँच है।
- निगरानी केंद्र मुख्यतः शहरी और तृतीयक स्वास्थ्य संस्थानों में केंद्रित हैं।
- ग्रामीण और प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर प्रतिनिधित्व बहुत कम है।
- इससे राष्ट्रीय आँकड़े असंतुलित हो जाते हैं और समुदाय स्तर की वास्तविक स्थिति छिप जाती है।
- सीमित केंद्रों से प्राप्त आँकड़े देश की विविधता को सही ढंग से नहीं दर्शाते।
सार्वजनिक संस्थानों से आगे विस्तार की आवश्यकता
- निगरानी प्रणाली में निम्न को शामिल करना आवश्यक है:
- प्राथमिक और द्वितीयक स्वास्थ्य केंद्र
- निजी अस्पताल और चिकित्सालय
- निजी क्षेत्र में एंटीबायोटिक का व्यापक उपयोग होता है।
- उन्हें बाहर रखने से प्रतिरोध की वास्तविक तस्वीर अधूरी रहती है।
- इनके शामिल होने से:
- अधिक प्रतिनिधिक राष्ट्रीय आँकड़े मिलेंगे
- नीतियाँ अधिक सटीक बन सकेंगी
- दवा-निर्धारण की निगरानी बेहतर होगी
वैश्विक मानकों के अनुरूपता
- वैश्विक कार्ययोजना में पाँच प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं:
- जागरूकता बढ़ाना
- निगरानी और अनुसंधान को सशक्त करना
- संक्रमण की घटनाओं को कम करना
- एंटीमाइक्रोबियल उपयोग का विवेकपूर्ण प्रबंधन
- जाँच, दवाओं और टीकों में सतत निवेश
- भारत का जन-संदेश जागरूकता के लक्ष्य से मेल खाता है।
- किंतु निगरानी विस्तार और प्रवर्तन में प्रगति असमान बनी हुई है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति और निवेश की भूमिका
- निगरानी विस्तार केवल तकनीकी विषय नहीं है।
- इसके लिए आवश्यक है:
- सतत वित्तीय निवेश
- केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय
- प्रभावी नियामक प्रवर्तन
- मज़बूत राजनीतिक प्रतिबद्धता
- इनके अभाव में समस्या के वास्तविक आकार का सही आकलन नहीं हो पाएगा।
निष्कर्ष
- ‘मन की बात’ में दिया गया संदेश एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध को सामूहिक राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत करता है।
- यह जागरूकता की दिशा में एक आवश्यक पहला कदम है।
- किंतु इसे प्रणालीगत सुधारों के माध्यम से आगे बढ़ाना अनिवार्य है।
- इसके लिए आवश्यक है:
- शहरी सार्वजनिक अस्पतालों से आगे निगरानी नेटवर्क का विस्तार
- निजी और प्राथमिक स्वास्थ्य संस्थानों का समावेशन
- ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण का प्रभावी क्रियान्वयन
- जब व्यवहार परिवर्तन को विश्वसनीय आँकड़ों, मज़बूत संस्थानों और राजनीतिक इच्छाशक्ति का समर्थन मिलेगा, तभी इस बढ़ती समस्या पर नियंत्रण संभव होगा।