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भारत के बहु-क्षेत्रीय निवारण और क्षमताओं की कुंजी

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )

विषय : GS पेपर: GS-3 (आंतरिक सुरक्षा, रक्षा प्रौद्योगिकी, रक्षा का स्वदेशीकरण, सुरक्षा चुनौतियाँ)

प्रसंग (Context)

यह संपादकीय भारत की चीन के संदर्भ में बढ़ती सैन्य चुनौती का विश्लेषण करता है और एक सुदृढ़ रक्षा-औद्योगिक आधार विकसित करने की तात्कालिक आवश्यकता पर बल देता है। इसमें यह रेखांकित किया गया है कि भारत को खंडित (piecemeal) क्षमता निर्माण से आगे बढ़कर एक बहु-क्षेत्रीय प्रतिरोध (Multi-Domain Deterrence) रणनीति अपनानी होगी, जिसमें प्रौद्योगिकी, सिद्धांत (doctrine) और औद्योगिक क्षमता का समेकित उपयोग हो, ताकि चीन की सैन्य बढ़त का प्रभावी मुकाबला किया जा सके।

मुख्य मुद्दा (Core Issue)

भारत को चीन के साथ क्षमता अंतर (capability gap) के बढ़ने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिसके प्रमुख कारण हैं:

  • सैन्य आवश्यकताओं का औद्योगिक उत्पादन में कमजोर रूपांतरण
  • रक्षा निर्माण में पैमाने (scale) और गति (speed) की कमी
  • युद्ध में उभरती प्रौद्योगिकियों के अपर्याप्त एकीकरण

मुख्य प्रश्न:
भारत किस प्रकार संरचनात्मक औद्योगिक और सिद्धांतगत सीमाओं को पार करते हुए एक विश्वसनीय, समेकित बहु-क्षेत्रीय प्रतिरोध ढांचा विकसित कर सकता है?


कठिन विकल्प और रणनीतिक दृष्टिकोण (Hard Choices and Strategic Approaches)

संपादकीय तीन संभावित रणनीतिक मार्ग प्रस्तुत करता है:

1. साहसिक प्रौद्योगिकीय छलांग (Bold Technological Leap)

  • अत्याधुनिक युद्ध प्रौद्योगिकियों में निवेश
  • जोखिम: क्रियान्वयन में विफलता नई कमजोरियाँ उत्पन्न कर सकती है
  • बाधा: नवाचारों को विस्तार देने के लिए सीमित औद्योगिक क्षमता

2. रूढ़िवादी क्रमिक दृष्टिकोण (Conservative Incremental Approach)

  • मौजूदा प्रणालियों के साथ उभरती प्रौद्योगिकियों का एकीकरण
  • साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं में सुधार
  • सीमा: इससे चीन के साथ रणनीतिक संतुलन में बड़ा बदलाव संभव नहीं

3. मध्य मार्ग (Preferred Strategy)

  • पारंपरिक प्रणालियों को बनाए रखते हुए सक्षम परतों का निर्माण:
    • कमांड एवं नियंत्रण (C2)
    • खुफिया, निगरानी और टोही (ISR)
    • गहन प्रहार (Deep-strike) और लॉजिस्टिक्स अवसंरचना
  • उद्देश्य: बहु-क्षेत्रीय संचालन (MDO) की ओर क्रमिक संक्रमण

संरचनात्मक एवं औद्योगिक बाधाएँ (Structural and Industrial Constraints)

भारत की प्रमुख चुनौती तकनीकी अक्षमता नहीं, बल्कि संस्थागत और औद्योगिक कमजोरी है:

  • रक्षा-औद्योगिक आधार में गति और पैमाने की कमी
  • पुरानी प्रणालियों (legacy platforms) पर निर्भरता और धीमी खरीद प्रक्रिया
  • सैन्य, उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच सीमित समन्वय

मुख्य आवश्यकता:
निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ रक्षा निर्माण का विस्तार


रक्षा औद्योगिक सुधार की आवश्यकता (Need for Defence Industrial Reform)

दीर्घकालिक क्षमता निर्माण के लिए भारत को:

  • नौकरशाही अवरोधों को कम करना होगा
  • बजटीय स्थिरता सुनिश्चित करनी होगी
  • दीर्घकालिक रक्षा अनुबंध प्रदान करने होंगे
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना होगा
  • राज्य-प्रधान मॉडल से मिश्रित (hybrid) औद्योगिक मॉडल की ओर बढ़ना होगा

यह इस विचार के अनुरूप है कि औद्योगिक क्षमता ही सैन्य शक्ति की रीढ़ होती है।


सक्षम परतों का सुदृढ़ीकरण (Fixing the Enabling Layers)

आधुनिक युद्ध केवल प्लेटफॉर्म पर नहीं, बल्कि सक्षम प्रणालियों पर निर्भर करता है:

1. C4ISR प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण

  • कमांड, नियंत्रण, संचार, कंप्यूटर, खुफिया, निगरानी और टोही
  • वास्तविक समय (real-time) युद्धक्षेत्र जागरूकता और समन्वय सक्षम करता है

2. स्तरित युद्ध क्षमता (Layered Warfare Capability)

  • प्रहार स्तर: मिसाइल, ड्रोन, विमान
  • अग्रिम स्तर: टैंक, पैदल सेना
  • समर्थन स्तर: लॉजिस्टिक्स और अवसंरचना

3. सूचना एवं इलेक्ट्रॉनिक प्रभुत्व

  • साइबर युद्ध, अंतरिक्ष क्षमताएँ, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध
  • शत्रु की ISR प्रणालियों को निष्क्रिय करने की क्षमता

रणनीतिक प्रतिरोध के आयाम (Strategic Deterrence Dimensions)

  • भारत को चीन की कमजोरियों की पहचान कर उनका उपयोग करना होगा
  • दीर्घकालिक संघर्ष के लिए सस्ते और विस्तार योग्य ISR सिस्टम विकसित करने होंगे
  • पारंपरिक असमानता को संतुलित करने हेतु परमाणु प्रतिरोध को मजबूत करना होगा

मुख्य चिंता:
चीन की उच्च औद्योगिक क्षमता उसे युद्धकाल में तेज उत्पादन की सुविधा देती है, जिससे भारत के लिए इन्वेंटरी अंतर (inventory gap) बढ़ता है।


खरीद और क्षमता प्राथमिकता (Procurement and Capability Prioritisation)

भारत की खरीद रणनीति में बदलाव आवश्यक है:

  • सेवा-विशिष्ट खरीद → समेकित क्षमता निर्माण
  • मात्रात्मक व्यय → रणनीतिक प्राथमिकता आधारित निवेश

इसके लिए आवश्यक है:

  • राजनीतिक-सैन्य सहमति
  • स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य और समझौते (trade-offs)

आगे की राह (Way Forward)

  • अलग-अलग खरीद के बजाय सक्षम परतों पर ध्यान केंद्रित करना
  • एक सुदृढ़ रक्षा-औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण
  • थिएटर एकीकरण और सिद्धांतगत समन्वय को बढ़ावा देना
  • घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित कर इन्वेंटरी अंतर को कम करना
  • बहु-क्षेत्रीय युद्ध क्षमता की ओर तेज़ी से संक्रमण

निष्कर्ष (Conclusion)

भारत की प्रतिरोध क्षमता केवल उन्नत हथियारों के अधिग्रहण पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि प्रौद्योगिकी, सिद्धांत और औद्योगिक शक्ति के समेकित संयोजन पर आधारित होगी।

यदि भारत अपने रक्षा-औद्योगिक आधार और सक्षम परतों को सुदृढ़ नहीं करता, तो चीन के संदर्भ में उसकी रणनीतिक भेद्यता बढ़ सकती है।

अतः बहु-क्षेत्रीय, औद्योगिक रूप से समर्थित प्रतिरोध की ओर संक्रमण केवल विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्यता है।


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