The Hindu Editorial in Hindi
01 July 2026
भारत के रणनीतिक भविष्य के लिए सॉवरेन AI की नई परिकल्पना
(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)
विषय: GS-2: गवर्नेंस | अंतरराष्ट्रीय संबंध | डिजिटल पॉलिसी, GS-3: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस | विज्ञान और तकनीक | डिजिटल अर्थव्यवस्था | रणनीतिक सुरक्षा
संदर्भ
विश्व के अनेक देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को एक रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में देख रहे हैं।
संपादकीय का तर्क है कि भारत को वैश्विक स्तर पर जुड़ा रहना चाहिए, साथ ही दीर्घकालिक तकनीकी निर्भरता को कम करने के लिए धीरे-धीरे स्वदेशी एवं संप्रभु एआई क्षमताओं का विकास करना चाहिए।
मुख्य विचार
• भारत को तकनीकी अलगाव से बचना चाहिए।
• वर्तमान में विश्व की सर्वोत्तम एआई तकनीकों का उपयोग करते हुए भविष्य के लिए स्वदेशी एआई क्षमता का निर्माण करना चाहिए।
• लक्ष्य तकनीकी संरक्षणवाद नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता होना चाहिए।
मुख्य मुद्दे
वैश्विक एआई भू-राजनीति
• एआई नीति राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है।
• अनेक देश उन्नत एआई तकनीकों तक पहुँच पर प्रतिबंध लगा रहे हैं।
• विदेशी एआई प्लेटफ़ॉर्मों पर निर्भरता रणनीतिक कमजोरियाँ उत्पन्न करती है।
भारत की स्थिति
• मजबूत सूचना प्रौद्योगिकी सेवा क्षेत्र।
• विशाल डिजिटल बाजार।
• अत्याधुनिक एआई मॉडल एवं उच्च क्षमता वाली संगणना (कंप्यूट) अवसंरचना का अभाव।
• अनुसंधान एवं विकास पर कम व्यय (लगभग सकल घरेलू उत्पाद का 0.6%)।
रणनीतिक चुनौती
• भारत वैश्विक एआई अग्रणी देशों की तरह अत्यधिक निवेश नहीं कर सकता।
• इसलिए भारत को निम्नलिखित का संतुलित संयोजन अपनाना होगा–
• वैश्विक एआई सहयोग।
• घरेलू क्षमता निर्माण।
• आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण।
• प्रौद्योगिकी साझेदारियाँ।
प्रमुख सुझाव
संप्रभु एआई क्षमता का निर्माण
• स्वदेशी आधारभूत एआई मॉडलों में निवेश करना।
• देश में एआई संगणना अवसंरचना का विस्तार करना।
• सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना।
• विश्वविद्यालयों एवं स्टार्टअप्स में एआई अनुसंधान को बढ़ावा देना।
प्रौद्योगिकी साझेदारियों का विविधीकरण
• विभिन्न वैश्विक एआई पारिस्थितिकी तंत्रों के साथ सहयोग बढ़ाना।
• किसी एक देश या कंपनी पर निर्भरता कम करना।
• विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को प्रोत्साहित करना।
सरकार की भूमिका
• सहायक सार्वजनिक नीतियों के माध्यम से रणनीतिक जोखिमों को साझा करना।
• दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहित करना।
• अन्य रणनीतिक क्षेत्रों की भाँति एआई अवसंरचना को समर्थन देना।
• स्थिर एवं स्पष्ट नियामकीय ढाँचे के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देना।
उद्योग की भूमिका
• उत्पादों की गुणवत्ता एवं नवाचार में सुधार करना।
• वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी एआई अनुप्रयोग विकसित करना।
• अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार करना।
• वैश्विक स्तर पर विस्तार योग्य डिजिटल उत्पाद तैयार करना।
चुनौतियाँ
• विदेशी एआई मॉडलों पर अत्यधिक निर्भरता।
• निजी क्षेत्र द्वारा अनुसंधान एवं विकास में सीमित निवेश।
• एआई अवसंरचना की उच्च लागत।
• भारतीय एआई उत्पादों की सीमित वैश्विक उपस्थिति।
• भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण उन्नत प्रौद्योगिकी तक पहुँच में कठिनाई।
यूपीएससी मूल्य संवर्धन
प्रमुख शब्द
• संप्रभु कृत्रिम बुद्धिमत्ता
• रणनीतिक स्वायत्तता
• डिजिटल संप्रभुता
• विश्वसनीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता
• एआई संगणना क्षमता
• अत्याधुनिक एआई मॉडल
• प्रौद्योगिकी लचीलापन
• नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र
समालोचनात्मक विश्लेषण
सकारात्मक पक्ष
• वैश्विक सहयोग एवं राष्ट्रीय क्षमता निर्माण के बीच संतुलन स्थापित करता है।
• दीर्घकालिक तकनीकी आत्मनिर्भरता एवं लचीलेपन पर बल देता है।
• सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्रों की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।
सीमाएँ
• एआई अवसंरचना में अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होगी।
• भारत का घरेलू एआई पारिस्थितिकी तंत्र अभी विकासशील अवस्था में है।
• प्रतिभा संरक्षण तथा उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स तक पहुँच अभी भी प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
आगे की राह
• अनुसंधान एवं विकास में निवेश को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाना।
• संप्रभु एआई संगणना अवसंरचना का निर्माण करना।
• स्वदेशी एआई स्टार्टअप्स एवं मुक्त-स्रोत (ओपन सोर्स) एआई पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना।
• सेमीकंडक्टर विनिर्माण को सुदृढ़ करना।
• रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए अंतरराष्ट्रीय एआई सहयोग को गहरा करना।
• केवल सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएँ प्रदान करने के बजाय वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी एआई उत्पाद विकसित करना।
निष्कर्ष
भारत की एआई रणनीति का आधार वैश्विक सहयोग तथा घरेलू क्षमता निर्माण का संतुलित समन्वय होना चाहिए। वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता अलगाव से नहीं, बल्कि सशक्त संस्थानों, मजबूत नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रौद्योगिकियों के विकास से प्राप्त होगी।