The Hindu Editorial Analysis in Hindi
14 January 2026
भारत को AI और इसके पर्यावरणीय प्रभाव पर ध्यान देना चाहिए।
(Source – The Hindu, International Edition – Page No. – 8)
विषय : जीएस पेपर – जीएस-3 : विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, शासन
प्रसंग
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेजी से स्वास्थ्य, कृषि और शासन सहित अनेक क्षेत्रों में नीति निर्माण और आर्थिक विमर्श का केंद्र बन गई है।
- किंतु एआई के विकास और उपयोग से जुड़ी पर्यावरणीय लागतों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है।
- संपादकीय वैश्विक साक्ष्यों की ओर संकेत करता है कि बड़े एआई मॉडल और डेटा केंद्र भारी मात्रा में ऊर्जा, कार्बन और जल का उपभोग करते हैं।
- जैसे-जैसे भारत एआई को तेजी से अपनाता जा रहा है, इन पर्यावरणीय प्रभावों को पहचानना, मापना और नीति के माध्यम से नियंत्रित करना आवश्यक हो गया है।

मुख्य मुद्दा
- केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या भारत की एआई रणनीति एआई के पर्यावरणीय बाह्य प्रभावों को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखती है।
- एआई को जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
- लेकिन यदि इसके उत्सर्जन, संसाधन क्षरण और पारिस्थितिक दबावों को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह स्वयं सतत विकास लक्ष्यों को कमजोर कर सकता है।
एआई विकास की पर्यावरणीय लागत
- ओईसीडी और यूएनईपी के आकलन बताते हैं कि:
- एआई एल्गोरिद्म के विकास और उपयोग से कार्बन फुटप्रिंट बढ़ता है।
- वैश्विक आईसीटी क्षेत्र कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 1.8 से 2.8 प्रतिशत योगदान करता है।
- कुछ आकलनों में यह योगदान 3.9 प्रतिशत तक बताया गया है।
- एआई डेटा केंद्र अत्यधिक ऊर्जा और जल की खपत करते हैं।
- शोध दर्शाते हैं कि:
- एक बड़े भाषा मॉडल के प्रशिक्षण से लाखों किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो सकता है।
- एआई का नियमित उपयोग भी पारंपरिक डिजिटल खोजों की तुलना में कई गुना अधिक ऊर्जा लेता है।
- इससे यह धारणा चुनौती में पड़ती है कि एआई का पर्यावरणीय प्रभाव नगण्य है।
जल संकट और संसाधन उपभोग
- यूएनईपी के अनुमान के अनुसार:
- वर्ष 2027 तक एआई सर्वर 4.2 से 6.6 अरब घन मीटर जल का उपभोग कर सकते हैं।
- इससे जल अभाव की स्थिति और गंभीर हो सकती है।
- डेटा केंद्रों को ठंडा करने की आवश्यकता जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में विशेष जोखिम पैदा करती है।
- ऊर्जा के अतिरिक्त एआई का प्रभाव निम्न पर भी पड़ता है:
- मीठे पानी की उपलब्धता
- भूमि उपयोग
- हार्डवेयर निर्माण हेतु प्राकृतिक संसाधनों का दोहन
- इससे स्पष्ट है कि एआई की पर्यावरणीय छाप केवल बिजली तक सीमित नहीं है।
आँकड़ों और पारदर्शिता की चुनौती
- संपादकीय चयनात्मक और अपूर्ण खुलासों पर निर्भरता के प्रति सावधान करता है।
- कंपनियों द्वारा प्रति-प्रश्न कम ऊर्जा खपत के दावे पूरे जीवनचक्र की वास्तविक लागत को छिपा सकते हैं।
- मानकीकृत रिपोर्टिंग के अभाव में स्वतंत्र सत्यापन कठिन हो जाता है।
- पारदर्शी और तुलनीय आँकड़ों के बिना नीति निर्माता प्रभावी विनियमन नहीं कर सकते।
वैश्विक प्रतिक्रिया और भारत की स्थिति
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर:
- यूनेस्को की 2021 की सिफारिशों में एआई के नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों को स्वीकार किया गया है।
- यूरोपीय संघ और अमेरिका ने एआई के पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़े नियामक ढाँचे विकसित करने शुरू किए हैं।
- यूरोपीय संघ में:
- एआई नियमों और स्थिरता रिपोर्टिंग की पहलें उभर रही हैं।
- भारत में:
- एआई शासन में पर्यावरणीय पहलुओं का समावेशन अभी प्रारंभिक अवस्था में है।
भारत में एआई के पर्यावरणीय प्रभाव का मापन
- संपादकीय के अनुसार, शमन से पहले मापन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- संभावित कदमों में शामिल हैं:
- बड़े एआई और डेटा केंद्र परियोजनाओं को पर्यावरण प्रभाव आकलन के दायरे में लाना।
- निम्न संकेतकों के लिए मापदंड विकसित करना:
- ऊर्जा उपयोग
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन
- जल उपभोग
- प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग
- इससे एआई विकास को मौजूदा पर्यावरणीय शासन ढाँचों के साथ जोड़ा जा सकता है।
मानक, प्रकटीकरण और ईएसजी की भूमिका
- सरकार निम्न कदम उठा सकती है:
- एआई के पर्यावरणीय प्रभाव के लिए मापन और रिपोर्टिंग मानक तय करना।
- प्रौद्योगिकी कंपनियों, थिंक टैंक और नागरिक समाज को प्रक्रिया में शामिल करना।
- एआई से जुड़े खुलासों को ईएसजी ढाँचे में शामिल करना।
- कॉर्पोरेट स्थिरता रिपोर्टिंग से प्रेरणा लेते हुए, डेटा केंद्रों और उच्च कंप्यूटिंग गतिविधियों के उत्सर्जन और संसाधन उपयोग का खुलासा अनिवार्य किया जा सकता है।
सतत एआई व्यवहार
- संपादकीय के अनुसार पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जा सकता है यदि:
- डेटा केंद्रों में नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग हो।
- बार-बार प्रशिक्षण के बजाय पूर्व-प्रशिक्षित और कुशल मॉडलों का प्रयोग किया जाए।
- एल्गोरिद्म को कम गणनात्मक मांग के लिए अनुकूलित किया जाए।
- एआई से संबंधित पर्यावरणीय आँकड़ों को पारदर्शी रूप से साझा किया जाए।
- इससे नवाचार को रोके बिना पर्यावरणीय क्षति घटाई जा सकती है।
आगे की राह
- भारत को एआई विमर्श में बदलाव करना होगा।
- एआई को केवल जलवायु समाधान के रूप में देखने के बजाय उसकी पर्यावरणीय लागतों को भी स्वीकार करना होगा।
- नवाचार और स्थिरता के बीच संतुलन आवश्यक है।
- अन्यथा एआई आधारित विकास पर्यावरण की दृष्टि से प्रतिकूल सिद्ध हो सकता है।
निष्कर्ष
- भारत की एआई महत्वाकांक्षाओं के साथ पर्यावरणीय शासन का समानांतर विकास आवश्यक है।
- एआई की पर्यावरणीय लागतों की उपेक्षा आज के डिजिटल लाभों को भविष्य की पर्यावरणीय देनदारी में बदल सकती है।
- प्रभावों का मापन, पारदर्शिता और सततता को नीति में समाहित करके भारत तकनीकी प्रगति को पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ सकता है।
- उत्तरदायी एआई केवल नैतिक और समावेशी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय रूप से सतत भी होना चाहिए।