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भारत-जर्मनी संबंध और भी ऊंचाइयों पर पहुंच सकते हैं।

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-8 )

विषय: जीएस पेपर – जीएस-2: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, द्विपक्षीय संबंध, व्यापार और प्रवासन

प्रसंग

  • जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की हालिया भारत यात्रा ने भारत–जर्मनी रणनीतिक साझेदारी को नई गति दी है।
  • अहमदाबाद में प्रधानमंत्री के साथ पतंग उड़ाने का दृश्य प्रतीकात्मक था, लेकिन इसके पीछे गहरे रणनीतिक संकेत निहित थे।
  • यह यात्रा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में हो रहे क्षरण और स्थिर विकास की साझा आवश्यकता को दर्शाती है।
  • संपादकीय के अनुसार भारत–जर्मनी संबंध अब आर्थिक, रणनीतिक और जन-केंद्रित अभिसरण के नए चरण में प्रवेश कर चुके हैं।

मुख्य मुद्दा

  • केंद्रीय प्रश्न यह है कि भारत और जर्मनी अपनी परस्पर पूरक क्षमताओं का उपयोग कैसे करें।
  • सहयोग के प्रमुख क्षेत्र हैं:
    • व्यापार
    • प्रवासन
    • रक्षा
    • वैश्विक शासन
  • यह साझेदारी अब केवल लेन-देन आधारित नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक हितों और लचीलापन पर आधारित है।

साझा आर्थिक हित

  • भारत और जर्मनी विश्व की तीसरी और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ हैं।
  • भारत की आर्थिक मजबूती से:
    • जर्मन वस्तुओं के लिए बड़ा बाज़ार बनता है।
    • जर्मन उपभोक्ताओं और कंपनियों को नए अवसर मिलते हैं।
  • भारत में जर्मनी की बढ़ती उपस्थिति से:
    • भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है।
    • भारत वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से अधिक गहराई से जुड़ता है।
  • वैश्विक अर्थव्यवस्था को शून्य-योग खेल नहीं माना जा सकता।
  • भारत की वृद्धि से जर्मनी को लाभ होता है और जर्मनी की मजबूती से भारत को।

व्यापार और रणनीतिक लचीलापन

  • चांसलर मर्ज़ की यात्रा का एक प्रमुख संदेश था:
    • यूरोपीय संघ–भारत मुक्त व्यापार समझौते की तात्कालिक आवश्यकता।
  • इस समझौते से:
    • दोनों अर्थव्यवस्थाओं को नई ऊँचाई मिल सकती है।
    • व्यापार युद्धों और आपूर्ति शृंखला व्यवधानों से जोखिम कम होगा।
    • द्विपक्षीय आर्थिक साझेदारी की नींव मजबूत होगी।
  • यह मर्ज़ की पश्चिमी गठबंधन से बाहर पहली यात्रा थी।
  • इससे संकेत मिलता है कि जर्मनी भारत को अपनी दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति के केंद्र में रखता है।

प्रवासन: एक रणनीतिक स्तंभ

  • प्रवासन भारत–जर्मनी संबंधों का एक प्रमुख आधार बनकर उभरा है।
  • जर्मनी भारतीय पेशेवरों को:
    • कुशल
    • अनुकूलनशील
    • प्रेरित
    • और अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाला मानता है।
  • यह सहयोग आधारित है:
    • सुरक्षित, वैध और पूर्वानुमेय प्रवासन मार्गों पर।
    • पारस्परिक लाभ पर, न कि अल्पकालिक श्रम शोषण पर।
  • चांसलर मर्ज़ की युवा भारतीयों से बातचीत इस साझेदारी के मानवीय पक्ष को दर्शाती है।

जन-जन और ज्ञान संबंध

  • भारतीय युवा पेशेवरों की विशेषताएँ हैं:
    • शीघ्र अनुकूलन क्षमता
    • मज़बूत शैक्षिक आधार
    • वैश्विक दृष्टिकोण
    • दीर्घकालिक धैर्य
  • विश्व के कई हिस्सों में अवसर सीमित हो रहे हैं।
  • ऐसे में जर्मनी का भारतीय प्रतिभाओं के प्रति खुलापन:
    • शैक्षणिक आदान-प्रदान बढ़ाता है।
    • कौशल गतिशीलता को प्रोत्साहित करता है।
    • समाजों के बीच स्थायी संबंध बनाता है।

राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष

  • वर्ष 2026 में भारत और जर्मनी अपने राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे करेंगे।
  • यह इस बात का संकेत है कि:
    • संबंध अब आकस्मिक सहयोग से आगे बढ़ चुके हैं।
    • वैश्विक अस्थिरता के बीच रणनीतिक समन्वय बढ़ा है।
    • भविष्य के लिए एक साझा दिशा स्पष्ट हो चुकी है।
  • यह अवसर उपलब्धियों को संस्थागत रूप देने और दीर्घकालिक रोडमैप तैयार करने का है।

आगे की राह

  • स्थायी साझेदारी के लिए प्रमुख आधार होंगे:
    • यूरोपीय संघ–भारत मुक्त व्यापार समझौते का अंतिम रूप।
    • रक्षा और सुरक्षा सहयोग का विस्तार।
    • प्रवासन और शिक्षा संबंधों को और मज़बूत करना।
    • जन-जन संपर्क को व्यापक बनाना।
  • आगामी अंतर-सरकारी परामर्श बैठकों से ठोस परिणाम निकलने की उम्मीद है।

निष्कर्ष

  • भारत–जर्मनी संबंध आर्थिक पूरकता, साझा रणनीतिक चिंताओं और मज़बूत मानवीय जुड़ाव से नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं।
  • अहमदाबाद में पतंग उड़ाने का दृश्य प्रतीकात्मक था, लेकिन यह साझेदारी वैश्विक उथल-पुथल के बीच साथ आगे बढ़ने के संकल्प को दर्शाती है।
  • दशकों पुराना यह संबंध दिखाता है कि दो लोकतांत्रिक देश आपसी विश्वास और आर्थिक महत्वाकांक्षा के साथ एक लचीली, भविष्य-केंद्रित साझेदारी बना सकते हैं।

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