The Hindu Editorial in Hindi
22 June 2026
भारत में जंक फ़ूड के विज्ञापन पर लगी खुली छूट को खत्म करें।
(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)
विषय: GS-2: स्वास्थ्य प्रशासन | सार्वजनिक नीति, GS-3: मानव विकास | पोषण
संदर्भ
भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) तथा उच्च वसा, चीनी और नमक (HFSS) युक्त खाद्य पदार्थों के आक्रामक विज्ञापन लगातार बढ़ रहे हैं। मोटापा, मधुमेह तथा अन्य गैर-संचारी रोगों (NCDs) से इनके संबंध के पर्याप्त प्रमाण होने के बावजूद खाद्य विज्ञापनों का नियमन अभी भी कमजोर है। संपादकीय का तर्क है कि भ्रामक खाद्य विपणन से बच्चों की सुरक्षा अब एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकता बन चुकी है।

मुख्य चिंता: जंक फूड विज्ञापन क्यों समस्या हैं?
भ्रामक स्वास्थ्य दावे
विज्ञापनों में चुनिंदा सकारात्मक पहलुओं को प्रमुखता दी जाती है, जैसे:
• “बेक्ड”
• “मल्टीग्रेन”
• “12-ग्रेन”
• “स्वास्थ्यवर्धक विकल्प”
जबकि अक्सर निम्न तथ्यों को छिपाया जाता है:
• उच्च चीनी मात्रा
• अत्यधिक नमक
• परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट
• कृत्रिम योजक एवं स्वादवर्धक पदार्थ
बच्चों पर प्रभाव
विज्ञापनों में निम्न का उपयोग किया जाता है:
• सेलिब्रिटी
• बाल कलाकार
• सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर
• भावनात्मक संदेश
इससे कम आयु में ही ब्रांड के प्रति आकर्षण और निष्ठा विकसित हो जाती है तथा उपभोक्ताओं की सूचित निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है।
विज्ञापन मांग उत्पन्न करते हैं
विपणन केवल उपभोग को प्रतिबिंबित नहीं करता, बल्कि खाद्य प्राथमिकताओं और खान-पान की आदतों को सक्रिय रूप से प्रभावित करता है। बार-बार संपर्क से अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों का अधिक उपभोग बढ़ता है।
UPFs एवं HFSS खाद्य पदार्थों के स्वास्थ्य जोखिम
इनका संबंध निम्न समस्याओं से पाया गया है:
• मोटापा
• टाइप-2 मधुमेह
• उच्च रक्तचाप
• हृदय रोग
• चयापचय संबंधी विकार
• बाल्यावस्था मोटापा
प्रमाण
द लैंसेट श्रृंखला (2025) ने UPFs के सेवन और बढ़ते गैर-संचारी रोगों के बोझ के बीच मजबूत संबंध को रेखांकित किया। UPFs का बढ़ता उपभोग पारंपरिक पौष्टिक खाद्य पदार्थों को प्रतिस्थापित कर रहा है।
वर्तमान नीतिगत अंतराल
राष्ट्रीय बहु-क्षेत्रीय कार्य योजना (NMAP)
• HFSS खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों पर प्रतिबंध की सिफारिश की गई थी।
• लेकिन इसका प्रभावी कार्यान्वयन सीमित रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
निम्न की आवश्यकता पर बल दिया गया:
• पैकेट के सामने चेतावनी लेबल (Front-of-Pack Warning Labels)
• बेहतर उपभोक्ता जागरूकता
• भ्रामक विज्ञापनों से संरक्षण
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26
• अस्वास्थ्यकर आहार संबंधी प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त की।
• अधिक सशक्त नीतिगत हस्तक्षेपों का आह्वान किया।
स्व-नियमन (Self-Regulation) क्यों पर्याप्त नहीं?
• उद्योग आधारित स्व-नियमन के परिणाम सीमित रहे हैं।
• लाभ कमाने की प्रवृत्ति अक्सर सार्वजनिक स्वास्थ्य हितों पर भारी पड़ती है।
• अंतरराष्ट्रीय अनुभव दर्शाता है कि अनिवार्य नियमन अधिक प्रभावी होता है।
वैश्विक उदाहरण
• ब्राज़ील – विद्यालयों के आसपास विज्ञापन प्रतिबंध।
• चिली – कठोर चेतावनी लेबल और विपणन नियंत्रण।
• मेक्सिको – अस्वास्थ्यकर खाद्य विज्ञापनों पर सख्त नियमन।
खाद्य वातावरण का महत्व
बच्चे निम्न माध्यमों से जंक फूड प्रचार के संपर्क में आते हैं:
• टेलीविजन
• सोशल मीडिया
• स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म
• खेल प्रायोजन
• इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग
• विद्यालय एवं सार्वजनिक स्थान
प्रभाव
• आजीवन उपभोग व्यवहार को प्रभावित करता है।
• पोषण शिक्षा के प्रयासों को कमजोर करता है।
• पारंपरिक आहारों की जगह प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के उपभोग को बढ़ावा देता है।
UPSC वैल्यू एडिशन
HFSS खाद्य पदार्थ
ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमें अत्यधिक मात्रा में:
• वसा (Fat)
• चीनी (Sugar)
• नमक (Salt)
होता है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs)
औद्योगिक रूप से निर्मित खाद्य पदार्थ जिनमें शामिल होते हैं:
• संरक्षक (Preservatives)
• स्वादवर्धक (Flavour Enhancers)
• कृत्रिम रंग (Artificial Colours)
• इमल्सीफायर (Emulsifiers)
• कृत्रिम मिठास (Sweeteners)
उदाहरण:
• चिप्स
• मीठे सीरियल
• शीतल पेय
• पैकेज्ड स्नैक्स
• इंस्टेंट फूड
आगे की राह
• बच्चों को लक्षित करने वाले HFSS एवं UPFs के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाया जाए।
• पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल अनिवार्य किए जाएँ।
• सेलिब्रिटी एवं इन्फ्लुएंसर प्रचार को विनियमित किया जाए।
• विद्यालयों के आसपास जंक-फूड मुक्त क्षेत्र बनाए जाएँ।
• उपभोक्ता जागरूकता अभियानों को मजबूत किया जाए।
• स्वस्थ पारंपरिक खाद्य विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए।
• निगरानी एवं प्रवर्तन तंत्र को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
निष्कर्ष
बढ़ते मोटापे और जीवनशैली संबंधी रोगों से केवल जागरूकता अभियानों के माध्यम से नहीं निपटा जा सकता। स्वस्थ खाद्य वातावरण के निर्माण हेतु भ्रामक विज्ञापनों पर कठोर नियमन तथा बच्चों को आक्रामक विपणन से प्रभावी संरक्षण प्रदान करना आवश्यक है।