The Hindu Editorial Analysis in Hindi
12 December 2025
मद्रास हाई कोर्ट को अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए
(Source – The Hindu, International Edition – Page No. – 8)
विषय: GS पेपर: GS-2 (न्यायपालिका, शासन, संवैधानिक निकाय)
प्रसंग
यह संपादकीय मद्रास उच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा की गई हालिया न्यायिक नियुक्ति-सिफारिशों से जुड़े विवाद का विश्लेषण करता है। विशेष रूप से वरिष्ठतम न्यायाधीशों में से एक न्यायमूर्ति निशा बानू को कॉलेजियम की सिफारिश से बाहर रखे जाने, जबकि किसी अन्य न्यायाधीश को बिना स्पष्ट कारण शामिल किए जाने पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। उच्च न्यायालय कॉलेजियम की इस चुप्पी ने प्रक्रिया, पारदर्शिता और संवैधानिक औचित्य को लेकर गहरी चिंताएँ उत्पन्न की हैं।

मुख्य मुद्दा
संविधान के अनुच्छेद 217 तथा निर्धारित प्रक्रिया-स्मरण (मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर) के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए गठित कॉलेजियम में शामिल होते हैं—
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, तथा
दो वरिष्ठतम न्यायाधीश।
इस प्रकरण में राज्य सरकार ने निम्न बिंदुओं पर स्पष्टीकरण माँगा—
न्यायमूर्ति निशा बानू, जो स्वयं कॉलेजियम की सदस्य थीं, उन्हें क्यों बाहर रखा गया?
किस संवैधानिक अथवा विधिक आधार पर किसी अन्य न्यायाधीश को उनके स्थान पर शामिल किया गया?
इन प्रक्रियात्मक प्रश्नों का समाधान करने के बजाय कॉलेजियम ने बिना किसी स्पष्ट उत्तर के आगे की सिफारिशें कर दीं।
प्रक्रिया का महत्व
संवैधानिक शासन व्यवस्था में प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं होती, बल्कि वैधता और विश्वास की आधारशिला होती है।
कॉलेजियम प्रणाली कोई विधायी व्यवस्था नहीं, बल्कि न्यायपालिका द्वारा विकसित एक तंत्र है।
इसकी वैधता तभी बनी रह सकती है जब यह अपने द्वारा निर्धारित मानकों और प्रक्रियाओं का कठोरता से पालन करे।
यदि किसी न्यायाधीश को बिना दर्ज कारणों के बाहर कर दिया जाए और किसी अन्य को अधिकार-क्षेत्र की स्पष्टता के बिना शामिल किया जाए, तो निर्णय लेने वाली संस्था की वैधता ही संदेह के घेरे में आ जाती है।
ऐसी स्थिति न्यायिक स्वतंत्रता और जन-विश्वास दोनों को कमजोर करती है।
संवैधानिक समस्या के रूप में चुप्पी
संपादकीय का तर्क है कि जब संस्थागत सत्यनिष्ठा और संविधानिक मर्यादा दाँव पर हो, तब चुप्पी को तटस्थता नहीं माना जा सकता।
स्पष्टीकरण का अभाव निम्न आशंकाओं को जन्म देता है—
मनमानी निर्णय-प्रक्रिया,
राजनीतिक, वैचारिक या व्यक्तिगत पक्षपात,
आंतरिक न्यायिक उत्तरदायित्व का क्षरण।
यह स्थिति न्यायपालिका की नैतिक शक्ति को कमजोर करती है, विशेषकर तब जब वही न्यायपालिका कार्यपालिका से कारणयुक्त और पारदर्शी निर्णयों की अपेक्षा करती है।
कॉलेजियम प्रणाली से जुड़ी संरचनात्मक चिंताएँ
यह प्रकरण कॉलेजियम प्रणाली को लेकर लंबे समय से उठ रही आलोचनाओं को उजागर करता है—
निर्णय-निर्माण में अपारदर्शिता,
लिखित कारणों का अभाव,
उत्तरदायित्व के प्रभावी तंत्रों की कमी,
विविधता और प्रतिनिधित्व को लेकर बढ़ती शंकाएँ।
यहाँ विवाद किसी व्यक्ति की योग्यता का नहीं, बल्कि इस प्रश्न का है कि क्या सिफारिश की पूरी प्रक्रिया संविधानिक मानकों और स्थापित नियमों के अनुरूप है या नहीं।
सुधार और न्यायिक आत्ममंथन की आवश्यकता
मद्रास उच्च न्यायालय को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी कार्रवाई संविधान और निर्धारित प्रक्रिया-स्मरण के अनुरूप थी या नहीं।
साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय को लंबे समय से लंबित सुधारात्मक माँगों पर पुनर्विचार करना चाहिए, जैसे—
कॉलेजियम की संरचना के स्पष्ट और बाध्यकारी नियम,
सिफारिशों के पीछे कारणों का अनिवार्य प्रकटीकरण,
न्यायिक विश्वसनीयता बनाए रखने हेतु अधिक पारदर्शिता।
लेख में उद्धृत तमिल नैतिक सूक्ति का सार यही है कि न्याय के लिए खोज, निष्पक्षता और कारणयुक्त निर्णय आवश्यक हैं, न कि मौन।
निष्कर्ष
न्यायिक स्वतंत्रता केवल कार्यपालिका के हस्तक्षेप से सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आंतरिक पारदर्शिता और प्रक्रियात्मक निष्ठा से भी सुदृढ़ होती है।
यदि कॉलेजियम की संरचना और कार्यप्रणाली ही संदिग्ध हो जाए, तो उसकी सिफारिशें वैधता खोने लगती हैं और इससे न्यायपालिका तथा राज्य के बीच संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है।
इसलिए चुप्पी तोड़ना कोई विकल्प नहीं, बल्कि भारत की न्यायिक संस्थाओं की अखंडता और विश्वसनीयता की रक्षा के लिए अनिवार्य आवश्यकता है।