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मानव-वन्यजीव संघर्ष क्षेत्रों में सह-अस्तित्व का प्रबंधन

(Source – The Hindu, International Edition – Page No. – 8)

विषय : GS पेपर: GS-3 (पर्यावरण, जैव विविधता, संरक्षण, आपदा और पारिस्थितिकी)

संदर्भ

संपादकीय में भारत और विश्व में बढ़ती मानव–वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict – HWC) की समस्या का विश्लेषण किया गया है। इसमें बताया गया है कि यह केवल संरक्षण का मुद्दा नहीं, बल्कि आवास विखंडन, भूमि उपयोग परिवर्तन, जलवायु दबाव और बढ़ती मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न जटिल सामाजिक-पर्यावरणीय समस्या है।

मुख्य मुद्दा

मुख्य मुद्दा मानव–वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती तीव्रता है, जिसके प्रमुख कारण हैं:

• आवास विनाश और विखंडन
• कृषि एवं अवसंरचना का विस्तार
• भोजन, जल और भूमि संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा
• कमजोर पारिस्थितिकीय योजना और सह-अस्तित्व तंत्र

मुख्य प्रश्न:

भारत संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में जैव विविधता संरक्षण, आजीविका सुरक्षा और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे स्थापित कर सकता है?


मानव–वन्यजीव संघर्ष की प्रकृति

• जब वन्यजीवों और मानव समुदायों के बीच नकारात्मक संपर्क होता है, तो उसे मानव–वन्यजीव संघर्ष कहा जाता है।

उदाहरण:

• हाथियों द्वारा मानवों पर हमला
• फसलों को नुकसान
• मांसाहारी जीवों द्वारा पशुधन का शिकार

अवलोकन:

अधिकांश संघर्ष आक्रामक पशु व्यवहार नहीं, बल्कि पारिस्थितिकीय प्रतिक्रियाएँ होते हैं।


संघर्ष के प्रमुख कारण

मुख्य संरचनात्मक कारण:

• वनों की कटाई
• आवास विखंडन
• वन्यजीव गलियारों पर अतिक्रमण
• कृषि विस्तार
• जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न पारिस्थितिकीय दबाव

निहितार्थ:

मानवीय गतिविधियाँ प्राकृतिक पशु आवागमन मार्गों को बाधित कर रही हैं।


पारिस्थितिकीय असंतुलन एवं भू-दृश्य परिवर्तन

• वन्यजीवों को बड़े प्रवासी और पारिस्थितिकीय गलियारों की आवश्यकता होती है।
• सड़कें, कृषि क्षेत्र और शहरीकरण प्राकृतिक मार्गों को अवरुद्ध करते हैं।

परिणाम:

पशु भोजन और आश्रय की तलाश में मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं।

मुख्य अंतर्दृष्टि:

संघर्ष अलग-थलग घटनाएँ नहीं, बल्कि व्यापक पारिस्थितिकीय असंतुलन का परिणाम हैं।


सह-अस्तित्व के वैश्विक उदाहरण

सफल अंतरराष्ट्रीय मॉडल:

• बोत्सवाना और नामीबिया:

• सामुदायिक आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन

• कोस्टा रिका:

• पारिस्थितिकीय गलियारों को विकास योजना में शामिल करना

• फिनलैंड:

• वास्तविक समय निगरानी एवं त्वरित मुआवजा प्रणाली

सामान्य विशेषता:

स्थानीय समुदायों की भागीदारी तथा आर्थिक प्रोत्साहन।


भारत की चुनौतियाँ

भारत द्वारा अपनाए गए उपाय:

• मुआवजा योजनाएँ
• सौर बाड़बंदी
• प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली
• कानूनी संरक्षण ढाँचा

फिर भी समस्याएँ बनी हुई हैं:

• मुआवजे में देरी
• वंचित समुदायों की सीमित पहुँच
• कमजोर समन्वय और योजना
• विखंडित क्रियान्वयन

अवलोकन:

केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं; प्रभावी पारिस्थितिकीय शासन भी आवश्यक है।


प्रतिक्रियात्मक उपायों की सीमाएँ

कुछ उपाय जैसे:

• प्रजनन नियंत्रण
• सीमित बाड़बंदी समाधान

भारत जैसे बड़े और विखंडित भू-दृश्य में सीमित प्रभाव रखते हैं।

चिंता:

संघर्ष प्रबंधन अक्सर मूल कारणों के बजाय केवल लक्षणों पर केंद्रित रहता है।


समुदाय-केंद्रित संरक्षण की आवश्यकता

भूटान और नेपाल के अनुभव:

• सामुदायिक प्रबंधित वन
• शिकारी-रोधी पशुधन बाड़े
• समन्वित चराई प्रणाली
• स्थिर संरक्षण वित्तपोषण

निहितार्थ:

जब समुदाय संरक्षण के सक्रिय भागीदार बनते हैं, तो सह-अस्तित्व बेहतर होता है।


जलवायु परिवर्तन का आयाम

• जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाता है।
• वन्यजीवों के प्रवास और व्यवहार में परिवर्तन लाता है।

परिणाम:

संघर्षों की आवृत्ति और अनिश्चितता बढ़ती है।

अवलोकन:

मानव–वन्यजीव संघर्ष अब पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि जलवायु शासन का भी मुद्दा बन चुका है।


समेकित भू-दृश्य योजना की आवश्यकता

संपादकीय निम्नलिखित उपायों की वकालत करता है:

• वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा
• पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील भूमि उपयोग योजना
• आवास संपर्कता को मजबूत करना
• स्थानीय स्तर पर अनुकूलनशील शासन प्रणाली विकसित करना

मुख्य सिद्धांत:

संरक्षण और आजीविका दोनों को साथ लेकर चलना होगा।


शिक्षा एवं जागरूकता की भूमिका

• जन-जागरूकता वन्यजीवों के प्रति शत्रुता कम कर सकती है।
• सह-अस्तित्व के प्रति सहिष्णुता और समझ विकसित करती है।

अवलोकन:

दीर्घकालिक समाधान केवल प्रशासनिक नियंत्रण नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति पर निर्भर करता है।


आगे की राह

• आवास पुनर्स्थापन और वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा मजबूत की जाए।
• समयबद्ध और पारदर्शी मुआवजा प्रणाली विकसित की जाए।
• समुदाय-आधारित संरक्षण मॉडल को बढ़ावा दिया जाए।
• विकास योजना में पारिस्थितिकीय विज्ञान को शामिल किया जाए।
• जलवायु-सहिष्णु संरक्षण रणनीतियाँ विकसित की जाएँ।
• स्थानीय जागरूकता और सहभागी शासन को मजबूत किया जाए।


निष्कर्ष

मानव–वन्यजीव संघर्ष कोई असामान्य घटना नहीं, बल्कि अस्थिर पर्यावरणीय और विकासात्मक नीतियों का स्वाभाविक परिणाम है।

चुनौती संघर्ष को पूरी तरह समाप्त करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सामाजिक और पारिस्थितिकीय दृष्टि से संतुलित तरीके से प्रबंधित करना है।

भारत के पर्यावरणीय भविष्य के लिए ऐसा सह-अस्तित्व मॉडल आवश्यक है जो जैव विविधता और मानव आजीविका दोनों की रक्षा कर सके।


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