The Hindu Editorial Analysis in Hindi
27 January 2026
रोजगार गारंटी पर लुका-छिपी खेलना
(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-8 )
विषय: जीएस पेपर – जीएस 2 और जीएस 3: शासन, कल्याणकारी योजनाएं, रोज़गार, सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास
प्रसंग
• हाल ही में लागू विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम (VB-G RAM G Act) ने व्यापक बहस को जन्म दिया है।
• केंद्र सरकार और उसके समर्थकों का दावा है कि यह कानून भारत की रोजगार गारंटी व्यवस्था को मजबूत करता है।
• आलोचकों का तर्क है कि यह कानून महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005 के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है।
• विवाद का मूल प्रश्न यह है कि क्या नया कानून वास्तव में रोजगार गारंटी का विस्तार करता है या केवल उसे नए नाम में प्रस्तुत कर उसके अधिकारों को कमजोर करता है।

मुख्य मुद्दा
• मुख्य चिंता यह है कि क्या VB-G RAM G Act रोजगार गारंटी की भावना को बनाए रखता है या विवेकाधिकार, बजट सीमा और मांग-आधारित वित्तपोषण को कमजोर करके उसे क्षीण करता है।
• यह बहस केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि काम को अधिकार के रूप में सुनिश्चित करने के राज्य के संवैधानिक और नैतिक दायित्व से जुड़ी है।
गारंटी, लेकिन बिना गारंटी के
• केंद्र सरकार का दावा है कि नया कानून मनरेगा की तरह ही रोजगार गारंटी देता है, बल्कि इसे 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन प्रति ग्रामीण परिवार कर देता है।
• यह दावा एक महत्वपूर्ण प्रावधान की अनदेखी करता है।
• नए कानून की धारा 5(1) रोजगार गारंटी को केंद्र सरकार की अधिसूचना पर निर्भर बनाती है।
• यह विवेकाधीन “स्विच-ऑफ” प्रावधान कानूनी गारंटी की अवधारणा को ही कमजोर करता है।
• जो गारंटी केवल अधिसूचना पर लागू हो, वह प्रशासनिक योजना से अलग नहीं रहती।
• उल्लेखनीय है कि 125 दिनों का प्रावधान मनरेगा के अंतर्गत भी किया जा सकता था।
• कई राज्य पहले से ही मनरेगा के तहत 125 दिन का रोजगार प्रदान कर रहे हैं।
• इस संदर्भ में नए कानून की आवश्यकता कमजोर प्रतीत होती है।
‘वंचना समाप्ति’ का तर्क
• VB-G RAM G Act के समर्थक दावा करते हैं कि यह पहले की ‘वंचना’ संबंधी धाराओं को हटाता है।
• यह तर्क तथ्यात्मक रूप से कमजोर है।
• मनरेगा में एक प्रावधान था, जिसका उद्देश्य निरर्थक कार्य मांग को रोकना था।
• यदि कोई व्यक्ति वास्तविक कार्य प्रस्ताव को ठुकराता था, तो उसे अस्थायी रूप से बेरोजगारी भत्ते से वंचित किया जा सकता था।
• व्यवहार में इस प्रावधान का कभी उपयोग नहीं हुआ और इससे कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ।
• नए कानून में ऐसी कोई ‘वंचना’ धारा है ही नहीं।
• इस आधार पर सुधार का दावा भ्रामक और अतिरंजित प्रतीत होता है।
मानक वित्तपोषण की ओर बदलाव
• सबसे गंभीर चिंता ‘मानक वित्तपोषण’ की अवधारणा से जुड़ी है।
• मनरेगा मूल रूप से मांग-आधारित कानून है, जिसमें धनराशि श्रमिकों की मांग के अनुसार उपलब्ध कराई जाती है।
• VB-G RAM G Act इस सिद्धांत को कमजोर करता है, क्योंकि इसमें केंद्रीय स्तर पर तय मानकों से अधिक व्यय को हतोत्साहित किया गया है।
• इससे बजटीय मानक वास्तविक व्यय सीमा में बदल जाते हैं।
• यह काम के कानूनी अधिकार को कमजोर करता है।
• समर्थकों का तर्क है कि मानक वित्तपोषण से राज्यों के बीच समानता आएगी।
• वास्तविकता यह है कि रोजगार मांग और राज्य की गरीबी दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया है।
• कई गरीब राज्यों में कमजोर क्रियान्वयन के कारण मांग कम रहती है।
• संरचनात्मक असमानताओं को बजट सीमा से नहीं, बल्कि मजदूरी दर बढ़ाने से बेहतर तरीके से संबोधित किया जा सकता है।
पारदर्शिता और प्रौद्योगिकी
• नए कानून का एक और दावा डिजिटल तकनीक के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने का है।
• मनरेगा में पहले से ही सामाजिक अंकेक्षण, पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रावधान मौजूद हैं।
• डिजिटल उपकरणों का उपयोग मनरेगा में व्यापक रूप से हुआ है, लेकिन परिणाम मिश्रित रहे हैं।
• तकनीकी खामियों के कारण मजदूरी भुगतान में देरी हुई है।
• आधार आधारित और डिजिटल प्रणालियों की विफलता से श्रमिकों के अधिकार कमजोर हुए हैं।
• भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है; कुछ मामलों में नई प्रकार की बहिष्करण समस्याएँ सामने आई हैं।
• VB-G RAM G Act इन प्रावधानों को दोहराता है, लेकिन ज्ञात समस्याओं का समाधान नहीं करता।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
• संपादकीय के अनुसार, इस कानून के पीछे राजनीतिक उद्देश्य भी निहित हैं।
• मनरेगा को प्रतिस्थापित करने से केंद्र सरकार का नियंत्रण बढ़ता है।
• इससे पहले से स्थापित अधिकार-आधारित योजना को नए नाम से प्रस्तुत कर श्रेय लेने का अवसर मिलता है।
• यह प्रवृत्ति पहले भी कई कल्याणकारी योजनाओं में देखी गई है।
• रोजगार गारंटी कोई ब्रांडिंग अभ्यास नहीं, बल्कि गरिमा, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा संवैधानिक दायित्व है।
निष्कर्ष
• मनरेगा को VB-G RAM G Act से प्रतिस्थापित करने के पक्ष में ठोस तर्क नहीं दिखाई देते।
• सुधार और दक्षता की भाषा के बावजूद नया कानून रोजगार गारंटी के मूल स्तंभों को कमजोर करता है।
• इसमें अधिकारों के स्थान पर विवेकाधिकार लाया गया है।
• मांग-आधारित वित्तपोषण को बजट सीमा से बदला गया है।
• पुराने प्रावधानों को बिना सुधार के दोहराया गया है।
• रोजगार गारंटी ग्रामीण सुरक्षा और सामाजिक न्याय का एक सशक्त साधन है।
• सुधार का वास्तविक मार्ग कानूनों का नाम बदलने में नहीं, बल्कि मजदूरी बढ़ाने, समय पर भुगतान सुनिश्चित करने और काम के अधिकार को कानूनी गारंटी के रूप में बनाए रखने में है।