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वंदे मातरम, इसके छह छंद और एक सुलझा हुआ सवाल

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )

विषय: GS पेपर 2 – भारतीय संविधान और शासन

संदर्भ

गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी 2026 के आदेश के माध्यम से निर्देश दिया गया कि सभी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह पद गाए जाएँ तथा उपस्थित सभी व्यक्तियों को सावधान मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य होगा। इस निर्णय ने संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा 1937 में संविधान सभा द्वारा लिए गए निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले (बिजो एमैनुएल बनाम केरल राज्य, 1986) के आलोक में पुनः बहस छेड़ दी है।

विवाद वंदे मातरम् के सम्मान का नहीं है, बल्कि इस प्रश्न का है कि क्या राज्य इसके पूर्ण संस्करण में भागीदारी अनिवार्य कर सकता है।

1937 का ऐतिहासिक समझौता

अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने मुस्लिम प्रतिनिधियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों की समीक्षा की।

मुख्य निर्णय:
• राष्ट्रीय आयोजनों में केवल पहले दो पदों का उपयोग किया जाएगा।
• शेष पद, जिनमें दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवी-देवताओं का उल्लेख है, आधिकारिक उपयोग का भाग नहीं होंगे।
• यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था और इसे तुष्टिकरण नहीं, बल्कि सामूहिक विवेक का परिणाम माना गया।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी आधिकारिक प्रयोजन के लिए केवल पहले दो पदों के उपयोग का समर्थन किया, ताकि विविध समाज में एकता बनी रहे।

24 जनवरी 1950 को:
• जन गण मन को राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया गया।
• वंदे मातरम् को “समान सम्मान” दिए जाने की बात कही गई।
• किंतु आधिकारिक प्रयोजन हेतु केवल पहले दो पदों को ही स्वीकार किया गया।

यह एक जानबूझकर लिया गया संवैधानिक निर्णय था।

संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 51A(क) (मौलिक कर्तव्य)
• नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का सम्मान करने का दायित्व देता है।
• वंदे मातरम् का उल्लेख इसमें नहीं है।

राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971
• राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान की रक्षा करता है।
• वंदे मातरम् को इसमें शामिल नहीं किया गया है।

अनुच्छेद 19(1)(क)
• अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जिसमें मौन रहने का अधिकार भी सम्मिलित है।

अनुच्छेद 25
• अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है।

अतः वंदे मातरम् गाने की कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

बिजो एमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) में:
• तीन यहोवा के साक्षी छात्र राष्ट्रीय गान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे, परंतु गाया नहीं।
• उन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया।
• सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह निष्कासन अनुच्छेद 19 और 25 का उल्लंघन है।

न्यायमूर्ति ओ. चिन्नप्पा रेड्डी ने कहा:
• सम्मानपूर्वक खड़े रहना पर्याप्त है।
• गाने से इनकार करना अनादर नहीं है।
• अंतरात्मा की स्वतंत्रता को बहुमत की भावना से दबाया नहीं जा सकता।

न्यायालय ने अमेरिकी निर्णय वेस्ट वर्जीनिया राज्य शिक्षा बोर्ड बनाम बार्नेट (1943) का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि कोई भी प्राधिकारी यह निर्धारित नहीं कर सकता कि विचार या धर्म के विषय में क्या ‘आधिकारिक सत्य’ होगा।

यदि नागरिकों को राष्ट्रीय गान गाने के लिए भी बाध्य नहीं किया जा सकता, तो धार्मिक संदर्भ वाले वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण में भागीदारी अनिवार्य करना संवैधानिक रूप से अधिक कठिन हो जाता है।

मूल संवैधानिक प्रश्न

क्या राज्य देशभक्ति के नाम पर ऐसे गीत में भागीदारी अनिवार्य कर सकता है जिसमें स्पष्ट धार्मिक प्रतीक हों?

वंदे मातरम् के बाद के पदों में दुर्गा आदि देवियों का उल्लेख है। अनेक नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यकों के लिए, ऐसे पदों में भागीदारी उनकी अंतरात्मा और आस्था से टकरा सकती है।

संवैधानिक लोकतंत्र में देशभक्ति को बाध्य धार्मिक अभिव्यक्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता।

धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक नैतिकता

भारत की धर्मनिरपेक्षता धर्म-विरोध नहीं, बल्कि सभी आस्थाओं के प्रति समान सम्मान है।

1937 के समझौते ने:
• एकता की आवश्यकता को स्वीकार किया।
• सांस्कृतिक सम्मान और संवैधानिक बाध्यता में अंतर स्पष्ट किया।
• राष्ट्रवाद को अंतरात्मा पर हावी न होने देने का सिद्धांत स्थापित किया।

भागीदारी को बाध्य करना:
• अनुच्छेद 25 की सुरक्षा को कमजोर कर सकता है।
• संवैधानिक नैतिकता की अनदेखी कर सकता है।
• एकता के प्रतीक को विभाजन का कारण बना सकता है।

वास्तविक प्रश्न

विवाद वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व का नहीं है।

प्रश्न यह है कि:
• क्या देशभक्ति को बाध्य किया जा सकता है?
• क्या अंतरात्मा की स्वतंत्रता को राज्यादेश से दबाया जा सकता है?
• क्या कार्यपालिका, विधायी संशोधन या न्यायिक अनुमोदन के बिना स्थापित संवैधानिक स्थिति को बदल सकती है?

न्यायिक दृष्टिकोण स्पष्ट है:
• सम्मान को संवैधानिक सीमाओं से परे बाध्य नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

1937 का समझौता कमजोरी नहीं, बल्कि संवैधानिक विवेक था। इसने राष्ट्रीय भावना और बहुलतावाद के बीच संतुलन स्थापित किया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया कि सम्मानपूर्वक खड़ा रहना पर्याप्त है और मौन रहना संरक्षित अभिव्यक्ति है।

वंदे मातरम् के पूर्ण छह पदों को अनिवार्य करना अनुच्छेद 19 और 25 का उल्लंघन कर सकता है तथा भारत की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।

स्वतंत्र विचार और आस्था पर आधारित गणराज्य में देशभक्ति स्वैच्छिक होनी चाहिए, बाध्य नहीं। संविधान समान नागरिकता की माँग करता है, एकरूप उपासना की नहीं।


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