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शी-ट्रम्प शिखर सम्मेलन — ईरान पर छाया-युद्ध

(Source – The Hindu, International Edition – Page No. – 8)

विषय: GS पेपर: GS-2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध) और GS-3 (वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा)

प्रसंग

संपादकीय में अमेरिका–ईरान संकट के बीच संभावित शी–ट्रम्प वार्ता के भू-राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। इसमें तर्क दिया गया है कि ईरान अब अमेरिका–चीन रणनीतिक समीकरण को प्रभावित करने वाला एक केंद्रीय तत्व बन चुका है तथा बीजिंग इस संकट का उपयोग वैश्विक व्यवस्था में अपना प्रभाव बढ़ाने के अवसर के रूप में कर सकता है।

मुख्य मुद्दा

मुख्य प्रश्न अमेरिका–ईरान संघर्ष और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा के अंतर्संबंध से जुड़ा है, जहाँ:

• चीन कूटनीति के माध्यम से रणनीतिक लाभ प्राप्त करना चाहता है।
• अमेरिका पश्चिम एशिया के जटिल संघर्षों से बाहर निकलने का मार्ग खोज रहा है।
• ईरान दबाव का सामना करने के लिए असममित रणनीतियों का उपयोग कर रहा है।

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है:

क्या चीन ईरान संकट को वैश्विक शक्ति संतुलन को पुनर्परिभाषित करने के अवसर में बदल सकता है?

1972 का अमेरिका–चीन शिखर सम्मेलन: ऐतिहासिक समानता

संपादकीय निम्नलिखित घटनाओं से तुलना करता है:

• राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की 1972 की चीन यात्रा
• शीत युद्ध काल का रणनीतिक पुनर्संरेखण

उस समय के प्रमुख परिणाम:

• अमेरिका–चीन संबंधों में सुधार
• सोवियत गुट का कूटनीतिक अलगाव
• वियतनाम के संदर्भ में नई रणनीतिक पुनर्गणना

अवलोकन:

इतिहास यह दर्शाता है कि बड़े संकट कई बार भू-राजनीतिक पुनर्गठन के उत्प्रेरक बन जाते हैं।

ईरान: एक रणनीतिक साधन

ईरान ने असममित दृष्टिकोण अपनाया है, जिसके अंतर्गत:

• होर्मुज़ जलडमरूमध्य का रणनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में उपयोग
• वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान उत्पन्न करना
• विरोधी देशों के लिए रणनीतिक लागत बढ़ाना

प्रभाव:

• तेल की कीमतों में वृद्धि
• वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता
• अमेरिकी नेतृत्व पर घरेलू राजनीतिक दबाव

निहितार्थ:

ईरान ने अपनी सैन्य सीमाओं को रणनीतिक सौदेबाजी की शक्ति में परिवर्तित कर दिया है।

चीन: ईरान का प्रमुख सहायक

चीन की भूमिका:

• ईरानी तेल का सबसे बड़ा आयातक
• प्रमुख व्यापारिक भागीदार
• तेहरान के साथ महत्वपूर्ण कूटनीतिक संपर्ककर्ता

अवलोकन:

बीजिंग धीरे-धीरे ईरान का सबसे महत्वपूर्ण बाहरी सहयोगी बनता जा रहा है।

रणनीतिक महत्व:

ईरान पर चीन का प्रभाव भविष्य की किसी भी वार्ता में उसे विशेष भूमिका प्रदान करता है।

बदलते क्षेत्रीय समीकरण

हाल की परिस्थितियाँ संकेत देती हैं:

• ईरान के रुख में अधिक कठोरता
• प्रतिबंधों में राहत तथा सुरक्षा गारंटी की बढ़ती माँग
• ईरान संबंधी मामलों पर चीन–रूस सहयोग में वृद्धि

परिणाम:

अमेरिका की एकतरफा दबाव नीति को अधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।

चीन की संभावित रणनीतिक सोच

बीजिंग के संभावित उद्देश्य:

• व्यापार और प्रौद्योगिकी संबंधी मुद्दों पर अमेरिका से रियायतें प्राप्त करना
• स्वयं को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करना
• पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना

मुख्य चिंता:

कूटनीति शांति स्थापना के बजाय व्यापक रणनीतिक सौदेबाजी का माध्यम बन सकती है।

ऊर्जा सुरक्षा का आयाम

होर्मुज़ जलडमरूमध्य अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि:

• वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा यहीं से होकर गुजरता है।
• किसी भी प्रकार का व्यवधान विश्व ऊर्जा बाजारों को प्रभावित कर सकता है।

भारत जैसे देशों पर प्रभाव:

• तेल की कीमतों में वृद्धि
• मुद्रास्फीति का दबाव
• आपूर्ति श्रृंखला संबंधी जोखिम

अवलोकन:

क्षेत्रीय संघर्ष अब वैश्विक आर्थिक प्रभाव उत्पन्न करने लगे हैं।

वैश्विक व्यवस्था पर प्रभाव

यह संकट निम्नलिखित प्रवृत्तियों को उजागर करता है:

• बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ता रुझान
• एकतरफा हस्तक्षेपों की घटती प्रभावशीलता
• क्षेत्रीय और मध्यम शक्तियों की बढ़ती भूमिका

अवलोकन:

भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि कूटनीति और आर्थिक प्रभाव तक विस्तारित हो चुकी है।

चुनौतियाँ

• लंबे समय तक क्षेत्रीय अस्थिरता बने रहने की संभावना
• अनेक शक्तियों के शामिल होने से संघर्ष बढ़ने का जोखिम
• रणनीतिक और आर्थिक हितों में संतुलन स्थापित करने की कठिनाई

चिंता:

महाशक्ति प्रतिस्पर्धा संघर्ष समाधान को और अधिक जटिल बना सकती है।

आगे की राह

• एकतरफा दबाव के बजाय बहुपक्षीय कूटनीति को बढ़ावा दिया जाए।
• क्षेत्रीय संवाद तंत्रों को मजबूत किया जाए।
• समुद्री एवं ऊर्जा सुरक्षा ढाँचों को सुदृढ़ किया जाए।
• सभी हितधारकों को शामिल कर वार्ता-आधारित समाधान विकसित किए जाएँ।
• संकट आधारित कूटनीति को शून्य-योग प्रतिस्पर्धा बनने से रोका जाए।

निष्कर्ष

ईरान संकट अब केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यापक वैश्विक शक्ति राजनीति का हिस्सा बन चुका है। चीन, अमेरिका और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के परस्पर प्रतिस्पर्धी हितों के बीच कूटनीति स्वयं एक रणनीतिक संघर्ष का क्षेत्र बनती जा रही है। इस संकट की भावी दिशा उभरती वैश्विक व्यवस्था में शक्ति संतुलन को गहराई से प्रभावित कर सकती है।


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