The Hindu Editorial Analysis in Hindi
02 March 2026
सोलहवां वित्त आयोग — चूकें और चिंताएँ
(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )
विषय: जीएस पेपर 2 – राजनीति | जीएस पेपर 3 – अर्थव्यवस्था
प्रस्तावना
षोडश वित्त आयोग (Sixteenth Finance Commission) ने पर्याप्त लचीलेपन के साथ कार्य किया, क्योंकि इसके संदर्भ की शर्तें सीधे संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित थीं। पूर्ववर्ती वित्त आयोगों की भाँति इसने राजकोषीय संघवाद के दो प्रमुख आयामों पर ध्यान केंद्रित किया:
• ऊर्ध्वाधर वितरण (केंद्र–राज्य के बीच राजस्व का बँटवारा)
• क्षैतिज वितरण (राज्यों के बीच संसाधनों का वितरण)
यद्यपि इसने कुछ संरचनात्मक निरंतरता बनाए रखी, परंतु इसकी कार्यप्रणाली और प्रभावों को लेकर कई चिंताएँ उभरती हैं।
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I. ऊर्ध्वाधर आयाम
- विभाज्य कर-कोष में राज्यों की हिस्सेदारी
• चौदहवें वित्त आयोग ने राज्यों की हिस्सेदारी 32% से बढ़ाकर 42% की।
• पंद्रहवें वित्त आयोग ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद इसे 41% कर दिया।
• षोडश वित्त आयोग ने 41% को बनाए रखा।
इससे उच्च स्तर की कर-वितरण व्यवस्था को निरंतरता और अर्ध-स्थायित्व प्राप्त हुआ।
- उपकर और अधिभार का बढ़ता उपयोग
• उपकर और अधिभार राज्यों के साथ साझा नहीं किए जाते।
• इनके बढ़ते उपयोग से विभाज्य कर-कोष का प्रभावी आकार घटता है।
• आयोग ने इस मुद्दे का उल्लेख किया, परंतु इन्हें सीमित करने हेतु कोई ठोस सिफारिश नहीं की।
यह प्रवृत्ति राजकोषीय संघवाद की भावना को कमजोर करती है।
- राजस्व घाटा और क्षेत्र-विशिष्ट अनुदानों की समाप्ति
• राजस्व घाटा अनुदानों को जारी नहीं रखा गया।
• क्षेत्र-विशिष्ट या राज्य-विशिष्ट अनुदानों की सिफारिश नहीं की गई।
इससे संरचनात्मक राजकोषीय अंतर वाले राज्यों के लिए लक्षित समर्थन में कमी आई है।
- संसाधन अंतरण की प्रवृत्ति
केंद्र की सकल राजस्व प्राप्तियों में से अंतरण (कर-वितरण + अनुदान) का प्रतिशत:
• 11वाँ और 13वाँ वित्त आयोग काल: लगभग 27–28%
• 14वाँ वित्त आयोग: 35.6%
• 15वाँ वित्त आयोग: 34.4%
• 16वाँ वित्त आयोग (2026–27 अनुमान): 32.7%
यद्यपि यह ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर है, परंतु 14वें वित्त आयोग के शिखर के बाद गिरावट का रुझान दिखाई देता है।
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II. क्षैतिज आयाम
- “योगदान” मानदंड की शुरुआत
षोडश वित्त आयोग ने दक्षता को परिलक्षित करने हेतु “योगदान” नामक नया मानदंड जोड़ा, जिसे सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के आधार पर मापा गया।
हालाँकि:
• प्रत्यक्ष GSDP के बजाय GSDP का वर्गमूल प्रयोग किया गया।
• इससे समृद्ध राज्यों के लाभ को संतुलित किया गया।
- आय दूरी बनाम योगदान
• आय दूरी मानदंड अपेक्षाकृत गरीब राज्यों को लाभ देता है।
• योगदान मानदंड आर्थिक रूप से सशक्त राज्यों को प्रोत्साहित करता है।
GSDP का विपरीत दिशाओं में उपयोग समानता और दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है।
- कर प्रयास/राजकोषीय अनुशासन मानदंड का हटाया जाना
• राजकोषीय दक्षता का मानदंड समाप्त कर दिया गया।
• इससे विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन हेतु प्रोत्साहन कमजोर होता है।
यह कदम पूर्ववर्ती सुधारात्मक दृष्टिकोणों से असंगत प्रतीत होता है।
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III. हानि और लाभ
जिन राज्यों की सापेक्ष हिस्सेदारी में कमी बताई गई है, उनमें शामिल हैं:
• मध्य प्रदेश
• उत्तर प्रदेश
• पश्चिम बंगाल
• बिहार
• ओडिशा
• छत्तीसगढ़
• राजस्थान
• कई पूर्वोत्तर राज्य
समृद्ध राज्यों को भी समान रूप से लाभ नहीं मिला।
यह दर्शाता है कि सूत्र में किए गए परिवर्तनों से जटिल पुनर्वितरण प्रभाव उत्पन्न हुए हैं।
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IV. समानता और राजस्व अंतर अनुदान
केवल कर-वितरण से निम्न अंतर पूर्ण नहीं किए जा सकते:
• राज्यों के बीच सेवा वितरण लागत में अंतर
• स्वास्थ्य और शिक्षा व्यय की आवश्यकता
• भौगोलिक असमानताएँ
अनुच्छेद 275 आवश्यकता-आधारित अनुदानों का प्रावधान करता है।
राजस्व अंतर अनुदानों का समाप्त होना समानता के उद्देश्य को प्रभावित कर सकता है।
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व्यापक संघीय निहितार्थ
चिंताएँ:
• साझा न किए जाने वाले उपकरों पर बढ़ती निर्भरता
• राजकोषीय अनुशासन प्रोत्साहनों का हटाया जाना
• समानता-आधारित अनुदानों पर कम बल
• परिणामों की स्पष्टता के बिना सूत्र की जटिलता में वृद्धि
सकारात्मक पक्ष:
• 41% ऊर्ध्वाधर वितरण की निरंतरता
• दक्षता-उन्मुख योगदान मानदंड का समावेश
• शर्तरहित अंतरणों में अपेक्षाकृत वृद्धि
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आगे की दिशा
• उपकर और अधिभार का युक्तिकरण और सीमित उपयोग
• संतुलित राजकोषीय अनुशासन मानदंड की पुनर्स्थापना
• पारदर्शी मानकों के आधार पर राजस्व अंतर अनुदानों को सुदृढ़ करना
• प्रक्षेपणों और राजकोषीय मान्यताओं में पूर्वानुमेयता बढ़ाना
• संस्थागत संवाद के माध्यम से सहकारी संघवाद को सशक्त करना
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निष्कर्ष
षोडश वित्त आयोग ने ऊर्ध्वाधर वितरण में निरंतरता बनाए रखी है, परंतु क्षैतिज वितरण में किए गए परिवर्तनों ने समानता, प्रोत्साहन और समानीकरण के संदर्भ में प्रश्न उठाए हैं। भारत में राजकोषीय संघवाद को दक्षता और न्याय के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। यदि साझा न किए जाने वाले राजस्व स्रोतों और आवश्यकता-आधारित अनुदान संरचना की अनदेखी की गई, तो सहकारी संघवाद के क्षरण का जोखिम उत्पन्न हो सकता है।