The Hindu Editorial in Hindi
15 July 2026
भारत-अमेरिका रक्षा तकनीक संबंध — बड़ी महत्वाकांक्षाएं, सीमित नतीजे
(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)
विषय: GS 2 (भारत-अमेरिका संबंध, द्विपक्षीय समझौते, रणनीतिक साझेदारी) · GS 3 (रक्षा तकनीक, रक्षा विनिर्माण, आत्मनिर्भर भारत, विज्ञान और तकनीक)
Context
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका (अमेरिका) के बीच पिछले दो दशकों में रक्षा सहयोग में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।
हालाँकि, DTTI, iCET और INDUS-X जैसी महत्वाकांक्षी पहलों के बावजूद वास्तविक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सह-विकास (Co-development) और सह-उत्पादन (Co-production) अभी भी सीमित हैं।
हाल ही में GE F414 लड़ाकू इंजन कार्यक्रम में हुई देरी ने एक बार फिर रणनीतिक मंशा और औद्योगिक उपलब्धियों के बीच मौजूद अंतर को उजागर किया है।
Issue in Brief
भारत अमेरिकी रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है।
फिर भी यह साझेदारी प्रौद्योगिकी-केंद्रित होने के बजाय मुख्यतः खरीद (Procurement)-केंद्रित रही है।
निर्यात नियंत्रण (Export Controls), बौद्धिक संपदा (IP) संबंधी चिंताएँ तथा दोनों देशों की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताएँ वास्तविक रक्षा औद्योगिक सहयोग में बाधा बनी हुई हैं।
Static Background
रक्षा सहयोग में तेजी 2005–08 के भारत–अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद आई।
प्रमुख रक्षा समझौते
• LEMOA (2016)
• COMCASA (2018)
• BECA (2020)
भारत ने 2002 से अब तक 22 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक के अमेरिकी रक्षा उपकरण खरीदे हैं।
प्रमुख रक्षा खरीद
• अपाचे (Apache) हेलीकॉप्टर
• चिनूक (Chinook) हेलीकॉप्टर
• C-17 ग्लोबमास्टर
• C-130J सुपर हरक्यूलिस
• P-8I समुद्री गश्ती विमान
• M777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर
Key Dimensions
GE F414 लड़ाकू इंजन कार्यक्रम
• इसे भारत–अमेरिका रक्षा सह-उत्पादन का प्रमुख उदाहरण बनाया जाना था।
• हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) निम्नलिखित के लिए लाइसेंस प्राप्त विनिर्माण (Licensed Manufacturing) पर वार्ता कर रहा है:
• तेजस Mk-II
• भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रम
• वार्ताएँ निम्न कारणों से लंबित हैं:
• बौद्धिक संपदा (IP) विवाद
• प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (ToT) पर मतभेद
• निर्यात नियंत्रण प्रतिबंध
• परियोजना लागत में वृद्धि
• इंजन की अनुमानित लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता प्रभावित हुई है।
Defence Technology and Trade Initiative (DTTI)
• वर्ष 2012 में प्रारम्भ।
उद्देश्य
• सह-विकास
• सह-उत्पादन
• प्रौद्योगिकी सहयोग
• अनेक बैठकों के बावजूद DTTI के अंतर्गत बहुत कम प्रमुख रक्षा परियोजनाएँ साकार हो सकी हैं।
Initiative on Critical and Emerging Technologies (iCET)
• वर्ष 2022 में प्रारम्भ।
रक्षा सहयोग से आगे बढ़कर निम्न क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार:
• कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
• क्वांटम कंप्यूटिंग
• सेमीकंडक्टर
• जैव प्रौद्योगिकी
• दूरसंचार
• रक्षा नवाचार
• GE F414 परियोजना iCET की प्रमुख रक्षा परियोजना मानी गई, किंतु अब भी लंबित है।
INDUS-X
• वर्ष 2023 में प्रारम्भ।
उद्देश्य
• रक्षा स्टार्टअप्स को जोड़ना
• शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थानों को जोड़ना
• निजी उद्योग को जोड़ना
• निवेशकों को जोड़ना
मुख्य फोकस
• रक्षा नवाचार पारितंत्र
• स्टार्टअप सहयोग
• अब तक बड़े औद्योगिक परिणाम सामने नहीं आए हैं।
अन्य लंबित रक्षा परियोजनाएँ
निम्नलिखित सहयोग प्रस्ताव अभी भी लंबित हैं:
• जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल का सह-उत्पादन
• जनरल डायनेमिक्स इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल
• GE इंजन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण
• स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन सहयोग
• अनेक परियोजनाएँ लंबे समय से वार्ता के चरण में हैं और उनका कार्यान्वयन नहीं हो पाया है।
MQ-9B ड्रोन खरीद
• भारत ने 31 MQ-9B स्काईगार्डियन/सीगार्डियन ड्रोन खरीदने पर सहमति व्यक्त की है।
हालाँकि,
• यह मुख्यतः एक खरीद (Procurement) समझौता बना हुआ है।
अपेक्षित लाभ
• स्थानीय असेंबली
• स्वदेशी रखरखाव (Maintenance) पारितंत्र
• घरेलू MRO (Maintenance, Repair & Overhaul) क्षमता
• ये औद्योगिक लाभ अभी तक पूरी तरह प्राप्त नहीं हुए हैं।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की खाई
भारत का दृष्टिकोण
भारत चाहता है:
• स्वदेशी विनिर्माण
• प्रौद्योगिकी आत्मसात (Technology Absorption)
• बौद्धिक संपदा तक पहुँच
• दीर्घकालिक रक्षा आत्मनिर्भरता
• आयात पर निर्भरता में कमी
• भारत के लिए प्रौद्योगिकी साझेदारी ‘आत्मनिर्भर भारत’ का प्रमुख साधन है।
अमेरिका का दृष्टिकोण
अमेरिका उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों को रणनीतिक परिसंपत्ति (Strategic Asset) मानता है।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण निम्न कारणों से सीमित रहता है:
• ITAR (International Traffic in Arms Regulations)
• निर्यात नियंत्रण कानून
• राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
• बौद्धिक संपदा की सुरक्षा
• परिणामस्वरूप राजनीतिक सद्भावना अक्सर औद्योगिक सहयोग में परिवर्तित नहीं हो पाती।
Reciprocal Defence Procurement Agreement (RDPA)
प्रस्तावित RDPA का उद्देश्य
• रक्षा खरीद बाजारों में पारस्परिक पहुँच प्रदान करना
• रक्षा व्यापार को बढ़ावा देना
• रक्षा औद्योगिक सहयोग को सुदृढ़ करना
हालाँकि, प्रमुख चिंताएँ
• भारतीय और अमेरिकी रक्षा कंपनियों के बीच असमान प्रतिस्पर्धा
• भारत के उभरते रक्षा विनिर्माण पारितंत्र पर संभावित प्रभाव
• सार्थक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की सीमित गारंटी
Critical Analysis
Strengths
• भारत–अमेरिका रक्षा संबंधों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।
• संयुक्त सैन्य अभ्यासों के माध्यम से उच्च स्तर की अंतर-संचालनीयता (Interoperability) विकसित हुई है।
• हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मजबूत समुद्री सहयोग।
• उभरती प्रौद्योगिकियों में बढ़ता सहयोग।
• हिंद-प्रशांत सुरक्षा पर रणनीतिक अभिसरण।
• INDUS-X के माध्यम से निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी।
Structural Challenges
• सह-विकास की तुलना में खरीद पर अधिक जोर।
• प्रौद्योगिकी हस्तांतरण अभी भी अत्यधिक प्रतिबंधित।
• निर्यात नियंत्रण नियमों के कारण परियोजनाओं में देरी।
• बौद्धिक संपदा विवाद वार्ताओं को धीमा करते हैं।
• दोनों देशों की औद्योगिक अपेक्षाओं में अंतर।
• लागत वृद्धि से परियोजनाओं की व्यवहार्यता प्रभावित होती है।
• रक्षा सहयोग घोषणाओं में अधिक, क्रियान्वयन में कम दिखाई देता है।
Way Forward
• खरीदार–विक्रेता संबंध से आगे बढ़कर वास्तविक सह-विकास को बढ़ावा दिया जाए।
• प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए पूर्वानुमेय एवं स्पष्ट ढाँचा विकसित किया जाए।
• संयुक्त अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा साझा बौद्धिक संपदा को प्रोत्साहित किया जाए।
• दोनों देशों में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जाए।
• नई पहलें शुरू करने से पहले वर्तमान पहलों का शीघ्र क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
• तृतीय देशों को निर्यात हेतु संयुक्त विनिर्माण को बढ़ावा दिया जाए।
• एकमुश्त रक्षा खरीद के बजाय दीर्घकालिक औद्योगिक साझेदारियाँ विकसित की जाएँ।