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The Hindu Editorial in Hindi

16 July 2026

ईरान की विघटनकारी रणनीति: इसके वैश्विक परिणाम

(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)

विषय: GS 2 (भारत और उसके पड़ोसी देश, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, पश्चिम एशिया) · GS 3 (आंतरिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा)

Issue in Brief

हालिया ईरान–इज़राइल–अमेरिका संघर्ष ने क्षेत्रीय व्यवधान (Regional Disruption) की ईरान की रणनीति को उजागर किया है, विशेषकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) तथा उसके क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क के माध्यम से।

यद्यपि ये रणनीतियाँ अल्पकाल में ईरान को सामरिक बढ़त प्रदान कर सकती हैं, किन्तु दीर्घकाल में ये उसकी कूटनीतिक अलगाव (Diplomatic Isolation) को बढ़ा सकती हैं, वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को बाधित कर सकती हैं तथा आर्थिक विकास की संभावनाओं को कमजोर कर सकती हैं।

भारत के लिए इन घटनाक्रमों का सीधा प्रभाव ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, चाबहार बंदरगाह तथा क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ता है।

Static Background

ईरान की क्षेत्रीय रणनीति

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान ने निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित रणनीति अपनाई है:

• रणनीतिक स्वायत्तता

• पश्चिमी प्रभाव का प्रतिरोध

• क्षेत्रीय गैर-राज्य अभिनेताओं (Non-State Actors) का समर्थन

• प्रॉक्सी नेटवर्क के माध्यम से क्षेत्रीय प्रभाव का विस्तार

इस रणनीति को सामान्यतः “प्रतिरोध की धुरी” (Axis of Resistance) कहा जाता है।

Axis of Resistance के प्रमुख घटक

• हिज़्बुल्लाह (लेबनान)

• हमास (फिलिस्तीन)

• हूती (यमन)

• इराक एवं सीरिया के विभिन्न शिया मिलिशिया

ये संगठन प्रत्यक्ष पारंपरिक युद्ध से बचते हुए ईरान को सामरिक गहराई (Strategic Depth) प्रदान करते हैं।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)

• फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) तथा अरब सागर से जोड़ता है।

• विश्व के लगभग पाँचवें हिस्से के कच्चे तेल का व्यापार इसी मार्ग से होता है।

• भारत, चीन, जापान तथा दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई ऊर्जा आयातकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

किसी भी प्रकार की बाधा का तात्कालिक प्रभाव पड़ता है:

• वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर

• जहाज़रानी बीमा लागत पर

• समुद्री व्यापार पर

• ऊर्जा सुरक्षा पर

Key Dimensions

व्यवधान की ईरानी रणनीति

ईरान ने बढ़ते हुए निम्नलिखित साधनों का उपयोग किया है:

• समुद्री दबाव (Maritime Coercion)

• प्रॉक्सी युद्ध

• मिसाइल एवं ड्रोन हमले

• सामरिक संकेत (Strategic Signalling)

• ग्रे-ज़ोन युद्ध (Grey-Zone Warfare)

मुख्य उद्देश्य

• विरोधियों को निरुत्साहित करना

• विरोधियों की लागत बढ़ाना

• शासन की सुरक्षा सुनिश्चित करना

• वार्ता में अपनी सौदेबाज़ी क्षमता बढ़ाना

सामरिक दबाव के साधन के रूप में होर्मुज़ जलडमरूमध्य

हाल के कदम

• वाणिज्यिक जहाजों को धमकियाँ

• तेल टैंकरों पर हमले

• नौसैनिक गतिविधियों में वृद्धि

• मित्र देशों के लिए अलग पारगमन शुल्क (Transit Charges) का प्रस्ताव

इन गतिविधियों से वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों में अनिश्चितता बढ़ी है।

क्षेत्रीय प्रभाव

ईरान की गतिविधियों के परिणामस्वरूप:

• खाड़ी क्षेत्र में असुरक्षा बढ़ी

• सैन्य तैनाती में वृद्धि हुई

• क्षेत्रीय ध्रुवीकरण तेज हुआ

• बीमा एवं मालभाड़ा लागत बढ़ी

• वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं पर दबाव बढ़ा

इन घटनाक्रमों ने क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को कमजोर किया है।

भारत–ईरान संबंध

भारत और ईरान के बीच लंबे समय से सहयोग के प्रमुख क्षेत्र:

• ऊर्जा आयात

• चाबहार बंदरगाह

• अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC)

• मध्य एशिया तक संपर्क

• सभ्यतागत एवं सांस्कृतिक संबंध

साथ ही भारत ने संतुलन बनाए रखा है:

• संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संबंध

• इज़राइल के साथ संबंध

• खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों के साथ संबंध

भारत का कूटनीतिक दृष्टिकोण

भारत ने सदैव प्राथमिकता दी है:

• रणनीतिक स्वायत्तता

• शांत कूटनीति

• संवाद

• तनाव में कमी (De-escalation)

• अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान

भारत ने प्रत्यक्ष मध्यस्थता से परहेज़ किया है, किंतु सभी पक्षों से संयम बरतने की लगातार अपील की है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 2817 (2026)

संपादकीय के अनुसार भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2817 (2026) का समर्थन किया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय नौवहन को प्रभावित करने वाले हमलों की निंदा तथा शत्रुता समाप्त करने का आह्वान किया गया है।

(परीक्षा की दृष्टि से किसी भी हालिया UNSC प्रस्ताव का उल्लेख करने से पूर्व उसकी आधिकारिक स्थिति एवं पाठ की पुष्टि अवश्य करें।)

Strategic Implications

ऊर्जा सुरक्षा

भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है।

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से:

• कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि

• आयातित मुद्रास्फीति

• चालू खाते (Current Account) पर दबाव

• राजकोषीय चुनौतियाँ

समुद्री व्यापार

भारत का अधिकांश पश्चिमी समुद्री व्यापार खाड़ी क्षेत्र के निकट से होकर गुजरता है।

व्यवधान का प्रभाव:

• जहाज़रानी लागत में वृद्धि

• निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी

• आपूर्ति शृंखलाओं पर प्रभाव

• बीमा प्रीमियम में वृद्धि

चाबहार बंदरगाह

भारत ने चाबहार में निवेश किया है ताकि:

• अफगानिस्तान तक पहुँच बनाई जा सके

• मध्य एशिया तक संपर्क स्थापित हो

• पाकिस्तान पर निर्भरता कम हो

क्षेत्रीय अस्थिरता इसके व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं को धीमा कर सकती है।

बहुध्रुवीय कूटनीति

भारत का उद्देश्य:

• ईरान के साथ संबंध बनाए रखना

• GCC देशों के साथ साझेदारी मजबूत करना

• इज़राइल के साथ सहयोग बढ़ाना

• अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखना

इन सभी संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना भारत के लिए एक प्रमुख कूटनीतिक चुनौती है।

Critical Analysis

Strengths of India’s Approach

• रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी।

• सभी क्षेत्रीय पक्षों के साथ संवाद कायम रखा।

• समुद्री नौवहन की स्वतंत्रता का समर्थन किया।

• दीर्घकालिक संपर्क परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की।

• क्षेत्रीय संघर्षों का प्रत्यक्ष पक्ष बनने से परहेज़ किया।

Structural Challenges

क्षेत्रीय अस्थिरता

• निरंतर प्रॉक्सी संघर्ष अनिश्चितता बनाए रखते हैं।

ऊर्जा निर्भरता

• भारत अभी भी आयातित हाइड्रोकार्बन पर अत्यधिक निर्भर है।

समुद्री जोखिम

• होर्मुज़ में व्यवधान सीधे भारत के व्यापार एवं ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करता है।

सीमित कूटनीतिक प्रभाव

• भारत के सभी पक्षों के साथ अच्छे संबंध हैं, परंतु वह अकेले संघर्ष की दिशा बदलने हेतु पर्याप्त प्रभाव नहीं रखता।

भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण

• क्षेत्रीय एवं वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भारत की संतुलनकारी नीति को जटिल बनाती है।

Way Forward

• पश्चिम एशिया से परे कच्चे तेल के आयात स्रोतों में विविधीकरण किया जाए।

• सामरिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves–SPR) का विस्तार किया जाए।

• नवीकरणीय ऊर्जा एवं परमाणु ऊर्जा के विकास में तेजी लाई जाए।

• हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) को सुदृढ़ किया जाए।

• ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में खाड़ी देशों के साथ सहयोग बढ़ाया जाए।

• बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से शांतिपूर्ण संवाद का समर्थन जारी रखा जाए।

• चाबहार बंदरगाह एवं INSTC जैसी संपर्क परियोजनाओं को आगे बढ़ाते हुए आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक लचीला बनाया जाए।

• अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून तथा नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) का समर्थन किया जाए।


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