The Hindu Editorial in Hindi
18 July 2026
एक ऐसा ट्रेड डील जो भारत के कॉम्पिटिटिव कॉन्फिडेंस की परीक्षा लेता है
(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)
विषय: GS 2 (भारत-यूके संबंध, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार) · GS 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था, बाहरी क्षेत्र, विनिर्माण, रोज़गार)
संदर्भ
हाल ही में लागू हुए भारत–यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (Comprehensive Economic and Trade Agreement – CETA) को केवल निर्यात बढ़ाने वाला समझौता नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता (Competitiveness) को मजबूत करने वाले महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। यह समझौता भारतीय उद्योगों को अधिक दक्षता, नवाचार और गुणवत्ता के माध्यम से वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने का अवसर प्रदान करता है।
पृष्ठभूमि
• भारत–यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) जुलाई 2026 से प्रभावी हुआ।
• समझौते के तहत मूल्य के आधार पर भारत के लगभग 99% निर्यात पर यूके में शून्य सीमा शुल्क (Zero Customs Duty) लागू होगा।
• समझौते में डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (Double Contribution Convention – DCC) भी शामिल है, जिससे यूके में अस्थायी रूप से कार्यरत भारतीय पेशेवरों को दोहरी सामाजिक सुरक्षा (Social Security) अंशदान से राहत मिलेगी।
प्रमुख तर्क
1. निर्यात के नए अवसर
• समझौते का सबसे बड़ा तात्कालिक लाभ भारतीय निर्यात को मिलेगा।
• प्रमुख लाभार्थी क्षेत्र:
– वस्त्र एवं परिधान (Textiles & Garments)
– चमड़ा एवं फुटवियर (Leather & Footwear)
– समुद्री उत्पाद (Marine Products)
– प्रसंस्कृत खाद्य (Processed Food)
– इंजीनियरिंग उत्पाद (Engineering Goods)
– ऑटो कंपोनेंट्स (Auto Components)
– औषधि उद्योग (Pharmaceuticals)
• ये सभी श्रम-प्रधान (Labour-intensive) क्षेत्र हैं और बड़े पैमाने पर औपचारिक रोजगार सृजित कर सकते हैं।
2. रोजगार को बढ़ावा
• यूके द्वारा आयात शुल्क हटाने से भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
• उदाहरण:
– तिरुपुर का वस्त्र उद्योग
– आगरा का फुटवियर उद्योग
– एमएसएमई (MSME) निर्यातक
• कम शुल्क भारतीय कंपनियों को वैश्विक निर्यात ऑर्डर प्राप्त करने में सहायता करेगा।
3. औषधि क्षेत्र को लाभ
• भारत विश्व के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में से एक है।
• शुल्क-मुक्त (Duty-free) प्रवेश से भारतीय दवाएँ यूके बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगी।
4. सामाजिक सुरक्षा में राहत
• डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (DCC) भारतीय पेशेवरों पर सामाजिक सुरक्षा का अतिरिक्त बोझ कम करेगा।
• प्रमुख लाभ:
– पाँच वर्ष तक दोहरी सामाजिक सुरक्षा अंशदान से छूट।
– लगभग 75,000 भारतीय पेशेवरों को लाभ।
– लगभग 900 भारतीय कंपनियों को फायदा।
– प्रतिवर्ष लगभग 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर की बचत।
5. प्रतिस्पर्धा से उद्योगों का विकास
• नियंत्रित एवं चरणबद्ध प्रतिस्पर्धा भारतीय उद्योगों को अधिक सक्षम बनाती है।
• उदाहरण:
– ब्रिटिश कारों पर शुल्क में क्रमिक कमी।
– स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती।
• शुल्क कटौती कोटा (Quota) एवं समयबद्ध व्यवस्था के तहत होगी, जिससे भारतीय उद्योगों को समायोजन का समय मिलेगा।
6. संरक्षणवाद (Protectionism) की सीमाएँ
• स्थायी संरक्षण उद्योगों की दक्षता को कमजोर करता है।
• प्रतिस्पर्धा से बढ़ावा मिलता है:
– नवाचार (Innovation)
– उत्पादकता (Productivity)
– गुणवत्ता (Quality)
– उपभोक्ता कल्याण (Consumer Welfare)
• भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बाद अधिक मजबूत हुआ।
7. प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक
• केवल एफटीए (FTA) पर हस्ताक्षर पर्याप्त नहीं हैं।
• सफलता निर्भर करेगी:
– निर्यात तैयारी (Export Readiness)
– अनुपालन में सरलता (Ease of Compliance)
– एमएसएमई जागरूकता
– उद्योग तक पहुँच (Industry Outreach)
– एफटीए प्रावधानों का प्रभावी उपयोग
समालोचनात्मक विश्लेषण
प्रमुख शक्तियाँ
1. निर्यात विस्तार
• शुल्क-मुक्त पहुँच से भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता विकसित देशों के बड़े बाजार में बढ़ेगी।
2. रोजगार सृजन
• श्रम-प्रधान उद्योगों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
3. विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता
• प्रतिस्पर्धा से उत्पादकता, गुणवत्ता और तकनीकी उन्नयन को बढ़ावा मिलेगा।
4. सेवा क्षेत्र को लाभ
• दोहरी सामाजिक सुरक्षा अंशदान से राहत भारतीय पेशेवरों एवं कंपनियों के लिए लाभकारी होगी।
5. दीर्घकालिक आर्थिक दक्षता
• खुले बाजार नवाचार और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देते हैं तथा अत्यधिक संरक्षण पर निर्भरता कम करते हैं।
प्रमुख चिंताएँ
1. एमएसएमई की तैयारी
• अनेक छोटे निर्यातकों के लिए निम्नलिखित मानकों का पालन चुनौतीपूर्ण हो सकता है:
– यूके गुणवत्ता मानक
– रूल्स ऑफ ओरिजिन (Rules of Origin)
– सततता (Sustainability) मानक
– दस्तावेजी आवश्यकताएँ
2. आयात प्रतिस्पर्धा
• ऑटोमोबाइल एवं मादक पेय (Alcoholic Beverages) जैसे क्षेत्रों में विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
3. असमान लाभ
• निर्यात-उन्मुख उद्योगों को अधिक लाभ मिलेगा, जबकि कम प्रतिस्पर्धी उद्योगों को समायोजन लागत वहन करनी पड़ सकती है।
4. क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ
• भारत पूर्व में कई मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) का पूर्ण लाभ नहीं उठा पाया है, जिसके प्रमुख कारण हैं:
– जागरूकता की कमी
– जटिल प्रक्रियाएँ
– प्रशासनिक बाधाएँ
आगे की राह
• विशेषकर एमएसएमई के लिए एफटीए संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए।
• सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए तथा लॉजिस्टिक्स अवसंरचना में सुधार किया जाए।
• उत्पादों की गुणवत्ता को यूके के नियामकीय मानकों के अनुरूप उन्नत किया जाए।
• निर्यातोन्मुख उद्योगों के लिए कौशल विकास एवं तकनीकी सहायता को बढ़ावा दिया जाए।
• एफटीए उपयोग दर (FTA Utilisation Rate) की नियमित निगरानी कर क्षेत्र-विशिष्ट बाधाओं का समयबद्ध समाधान किया जाए।