The Hindu Editorial in Hindi
21 July 2026
कनाडा–भारत रक्षा सहयोग: सुरक्षित भविष्य की दिशा में साझेदारी
(Source – The Hindu, Editorial Page no. – 8)
विषय: GS 2 (भारत–कनाडा संबंध, द्विपक्षीय संबंध, रक्षा सहयोग, क्रिटिकल मिनरल्स) · GS 3 (आंतरिक सुरक्षा, रक्षा प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, क्रिटिकल मिनरल्स)
समाचार में क्यों:
• भारत और कनाडा बदलते वैश्विक सुरक्षा परिवेश के बीच अपने द्विपक्षीय संबंधों को पुनः सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहे हैं।
• दोनों देश रक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स, अंतरिक्ष तथा उन्नत प्रौद्योगिकी (Advanced Technology) के क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार कर रहे हैं।
• यह सहयोग विकसित होते भू-राजनीतिक (Geopolitical) परिदृश्य एवं वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के बीच रणनीतिक महत्व प्राप्त कर रहा है।
• इसका उद्देश्य विश्वास, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) लचीलापन तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना है.
मुख्य विवरण
• कनाडा अपनी रक्षा क्षमताओं का आधुनिकीकरण करते हुए भारत जैसे विश्वसनीय साझेदारों के साथ रणनीतिक सहयोग बढ़ा रहा है।
• दोनों देशों ने रक्षा संवाद (Defence Dialogue) को संस्थागत रूप देने तथा सैन्य-से-सैन्य सहयोग को मजबूत करने पर सहमति व्यक्त की है।
• रक्षा सहयोग का विस्तार उभरती प्रौद्योगिकियों, क्रिटिकल मिनरल्स, एयरोस्पेस तथा अंतरिक्ष सहयोग तक हो रहा है।
• यह साझेदारी आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण तथा इंडो-पैसिफिक सुरक्षा उद्देश्यों को समर्थन प्रदान करती है।
• बढ़ता रणनीतिक अभिसरण (Strategic Convergence) पूर्व की कूटनीतिक चुनौतियों से आगे बढ़कर भारत–कनाडा संबंधों को पुनर्जीवित करने का अवसर प्रदान करता है.
बदलता वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य
• आधुनिक युद्ध अब ड्रोन, स्वायत्त प्रणालियों (Autonomous Systems), साइबर क्षमताओं तथा अंतरिक्ष आधारित प्रौद्योगिकियों पर अधिक आधारित होता जा रहा है।
• भू-राजनीतिक संघर्षों की आवृत्ति बढ़ रही है, जिससे रक्षा तैयारियाँ रणनीतिक आवश्यकता बन गई हैं।
• कनाडा ने अपनी सशस्त्र सेनाओं को सुदृढ़ करने के लिए व्यापक रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रम की घोषणा की है।
• कनाडा का लक्ष्य वर्ष 2035 तक रक्षा व्यय को GDP के लगभग 5% तक बढ़ाना है तथा वह पहले ही NATO के 2% मानक को पार कर चुका है।
• ये परिवर्तन भारत–कनाडा रणनीतिक सहयोग को और गहरा करने के नए अवसर प्रदान करते हैं.
द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को सुदृढ़ बनाना
• भारत एवं कनाडा ने सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए संस्थागत रक्षा संवाद (Institutional Defence Dialogue) स्थापित किया है।
• नई दिल्ली एवं ओटावा में मान्यता प्राप्त रक्षा सलाहकार (Accredited Defence Advisers) नियुक्त किए गए हैं।
• भारतीय एवं कनाडाई नौसेनाएँ नियमित रूप से RIMPAC तथा Talisman Sabre जैसे बहुपक्षीय सैन्य अभ्यासों में भाग लेती हैं।
• भारत के राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (National Defence College) के प्रतिनिधिमंडलों ने कनाडाई संस्थानों के साथ सैन्य शिक्षा सहयोग को मजबूत किया है।
• नियमित सैन्य सहभागिता से अंतर-संचालन क्षमता (Interoperability), विश्वास निर्माण तथा रणनीतिक समझ को बढ़ावा मिलता है.
रक्षा प्रौद्योगिकी एवं विनिर्माण में सहयोग
• कनाडा भारत जैसे विश्वसनीय साझेदारों को रक्षा सह-विकास (Co-development) एवं रक्षा विनिर्माण में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
• कनाडा ने रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं के विविधीकरण हेतु Defence Industrial Strategy प्रारम्भ की है।
• अगली पीढ़ी की एयरोस्पेस प्रौद्योगिकी एवं ड्रोन नवाचार में निवेश किया जा रहा है।
• भारत का सुदृढ़ विनिर्माण पारितंत्र (Manufacturing Ecosystem) कनाडा की तकनीकी विशेषज्ञता का पूरक है।
• संयुक्त अनुसंधान, नवाचार तथा औद्योगिक साझेदारी दोनों देशों की रक्षा आत्मनिर्भरता को मजबूत कर सकती है.
अंतरिक्ष एवं उन्नत प्रौद्योगिकी साझेदारी
• दोनों देशों के पास अंतरिक्ष क्षेत्र में उन्नत क्षमताएँ उपलब्ध हैं।
• कनाडा को उपग्रह प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स तथा एयरोस्पेस प्रणालियों में विशेषज्ञता प्राप्त है।
• भारत की कम लागत वाली प्रक्षेपण क्षमता (Launch Capability) तथा विकसित हो रहा वाणिज्यिक अंतरिक्ष पारितंत्र (Commercial Space Ecosystem) पूरक शक्तियाँ प्रदान करते हैं।
• उपग्रह अनुप्रयोगों, पृथ्वी अवलोकन (Earth Observation) तथा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में सहयोग दोनों देशों के लिए पारस्परिक लाभ उत्पन्न कर सकता है।
• अंतरिक्ष सहयोग समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन तथा रणनीतिक निगरानी (Strategic Surveillance) को भी सुदृढ़ कर सकता है.
क्रिटिकल मिनरल्स: एक रणनीतिक प्राथमिकता
• क्रिटिकल मिनरल्स रक्षा उपकरणों, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन एवं स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
• कनाडा के पास यूरेनियम, कोबाल्ट, दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements) तथा टंगस्टन के विशाल भंडार हैं।
• भारत को अपनी विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इन रणनीतिक खनिजों के सुरक्षित एवं विविध स्रोतों की आवश्यकता है।
• दोनों देशों ने क्रिटिकल मिनरल्स वैल्यू चेन (Critical Minerals Value Chain) पर एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।
• मजबूत सहयोग वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता को कम करने में सहायक होगा.
चुनौतियाँ
• हाल के कूटनीतिक विवादों के कारण द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास की कमी (Trust Deficit) बनी हुई है।
• निर्यात नियंत्रण (Export Controls) एवं राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण सीमित रह सकता है।
• दीर्घकालिक साझेदारी के लिए निरंतर राजनीतिक प्रतिबद्धता एवं संस्थागत निरंतरता आवश्यक है।
• प्रतिस्पर्धी भू-राजनीतिक प्राथमिकताएँ रणनीतिक सहयोग की गति को धीमा कर सकती हैं।
• उन्नत प्रौद्योगिकियों में वाणिज्यिक निवेश के लिए स्पष्ट नियामकीय व्यवस्था (Regulatory Clarity) एवं पूर्वानुमेय नीतिगत ढाँचे की आवश्यकता होगी.
निष्कर्ष
• भारत एवं कनाडा रक्षा विनिर्माण, उन्नत प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष तथा क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में परस्पर पूरक क्षमताएँ रखते हैं।
• पारस्परिक विश्वास, साझा रणनीतिक हितों तथा सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखलाओं पर आधारित व्यावहारिक साझेदारी इंडो-पैसिफिक सुरक्षा को मजबूत कर सकती है।
• यह तकनीकी नवाचार एवं आर्थिक विकास को भी गति प्रदान करेगी।
• इस विकसित होते द्विपक्षीय संबंध की पूर्ण क्षमता का उपयोग करने के लिए निरंतर संस्थागत सहभागिता एवं रणनीतिक सहयोग आवश्यक होगा।
वर्णनात्मक प्रश्न:
“भारत–कनाडा रक्षा सहयोग अब पारंपरिक सैन्य सहभागिता से आगे बढ़कर प्रौद्योगिकी, क्रिटिकल मिनरल्स तथा सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखलाओं तक विस्तारित हो रहा है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)”