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प्रसंग

  • पिछले एक दशक में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर्यावरण मामलों में केवल प्रशासनिक कार्यवाही की वैधता की समीक्षा तक सीमित नहीं रही है।
  • न्यायालय ने कई मामलों में भविष्यपरक और नियामक स्वरूप के निर्देश देने शुरू किए हैं।
  • यह प्रवृत्ति विशेष रूप से वहाँ देखने को मिली है जहाँ वैधानिक नियामक संस्थाएँ धीमी, बिखरी हुई या अप्रभावी रही हैं।
  • समस्या यह है कि प्रक्रियागत त्रुटियों को सुधारने और नियामक अनुशासन बहाल करने के बजाय न्यायालय ने कई बार प्रबंधकीय भूमिका बनाए रखी।
  • संपादकीय का तर्क है कि पर्यावरण संरक्षण की मंशा के बावजूद इस दृष्टिकोण से अनिश्चितता बढ़ी है, नियामक संस्थाएँ कमजोर हुई हैं और संवैधानिक सीमाएँ धुंधली पड़ी हैं।

मुख्य मुद्दा

  • केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या पर्यावरण शासन में न्यायिक हस्तक्षेप संवैधानिक निगरानी से आगे बढ़कर वास्तविक नियमन में परिवर्तित हो गया है।
  • इससे सरकारों, नियामकों और प्रभावित पक्षों के लिए अस्थिरता उत्पन्न हो रही है।
  • चिंता न्यायालय की नीयत को लेकर नहीं, बल्कि उन संस्थागत प्रभावों को लेकर है जो तब उत्पन्न होते हैं जब न्यायालय नियामकों के स्थान पर स्वयं कार्य करने लगते हैं।

निर्णय और नीतिगत बदलाव

  • कई महत्वपूर्ण उदाहरण इस प्रवृत्ति को स्पष्ट करते हैं।

पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र

  • जून 2022 में संरक्षित क्षेत्रों के चारों ओर एक किलोमीटर का समान पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र अनिवार्य किया गया।
  • अप्रैल 2023 में जहाँ पहले से अधिसूचनाएँ मौजूद थीं, वहाँ इस नियम में ढील दी गई।
  • राज्यों द्वारा बताई गई व्यावहारिक कठिनाइयों को स्वीकार किया गया।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में डीज़ल वाहनों पर प्रतिबंध

  • दिसंबर 2015 में 2000 सीसी से अधिक क्षमता वाले डीज़ल वाहनों के पंजीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया।
  • अगस्त 2016 में यह प्रतिबंध हटाकर क्षतिपूरक शुल्क लागू किया गया।
  • वर्ष 2025 में पुराने डीज़ल और पेट्रोल वाहनों पर नए प्रतिबंध लगाए गए, जिन्हें बाद में भारत स्टेज-IV से नीचे के वाहनों तक सीमित किया गया।

पटाखों से संबंधित नियम

  • वायु प्रदूषण के कारण लगभग पूर्ण प्रतिबंध लगाए गए।
  • बाद में त्योहारों के दौरान प्रवर्तन और कानून-व्यवस्था की समस्याओं को देखते हुए इनमें ढील दी गई।
  • प्रत्येक मामले में पहले व्यापक नियम बनाए गए और फिर उन्हें बार-बार बदला गया, जिससे नियामक अस्थिरता पैदा हुई।

वैधता से परिणामों की ओर झुकाव

  • न्यायिक तर्क में एक स्पष्ट बदलाव देखा जा रहा है।
  • पहले जोर वैधता और वैधानिक अनुपालन पर था।
  • अब नीति के परिणामों और उसके प्रभावों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
  • एक मामले में पश्चात स्वीकृति को अस्वीकार किया गया, लेकिन कुछ ही महीनों बाद आर्थिक गतिविधियों में व्यवधान की आशंका के आधार पर उस रुख पर पुनर्विचार किया गया।
  • इससे सिद्धांत स्थायी कानून की बजाय आरंभिक बिंदु बनते दिखाई देते हैं।

विशेषज्ञता से जुड़ी समस्या

  • विशेषज्ञता का प्रयोग एक साथ औचित्य और विवाद का कारण बना है।
  • एक मामले में विशेषज्ञ समिति के आधार पर एक समान परिभाषा अपनाई गई।
  • बाद में अनपेक्षित कानूनी प्रभावों के कारण आदेश स्थगित कर नई समिति गठित की गई।
  • इसी प्रकार, समान पारिस्थितिक बफर प्रारंभ में निर्णायक लगे, लेकिन भौगोलिक और पारिस्थितिक विविधता को समाहित नहीं कर सके।
  • विशेषज्ञों पर निर्भरता और फिर उन्हें बदलना अनिश्चितता को बढ़ाता है।

न्यायिक स्वीकृति और उसके प्रभाव

  • जब न्यायालय व्यावहारिक रूप से स्वीकृति देने वाला प्राधिकरण बन जाता है, तब समस्याएँ गंभीर हो जाती हैं।
  • परियोजना प्रवर्तक और सरकारें वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले न्यायालय का रुख करती हैं।
  • प्रारंभिक न्यायिक स्वीकृति से अंतिमता का भाव उत्पन्न हो जाता है।
  • इससे बाद की सार्वजनिक आपत्तियाँ हतोत्साहित होती हैं।
  • नियमों में न्यायालय द्वारा संशोधन से यह भी तय होता है कि किसे सुना जाएगा और कौन-सा साक्ष्य मान्य होगा।
  • इससे सहभागी पर्यावरणीय निर्णय प्रक्रिया कमजोर हो सकती है।

निरंतर निर्देश और अस्थिरता

  • अनेक पर्यावरणीय मामले निरंतर निर्देशों के ढाँचे में फँसे रहते हैं।
  • बार-बार अंतरिम आदेश, समितियों की रिपोर्ट और शपथपत्र सामने आते हैं।
  • इससे लचीलापन तो मिलता है, लेकिन स्थिरता और पूर्वानुमेयता कम हो जाती है।
  • नियामित पक्षों के लिए स्पष्ट मानकों की जगह परिवर्तनीय नियम बन जाते हैं।
  • सरकारों को समानांतर निर्णय संरचनाओं से जूझना पड़ता है।

स्थिरता और संस्थागत अनुशासन की आवश्यकता

  • संपादकीय का मत है कि न्यायालय को अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
  • पर्यावरण की रक्षा नियामकों को अनुशासित करके की जानी चाहिए, उन्हें प्रतिस्थापित करके नहीं।
  • यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में न्यायिक प्रबंधकीय निर्देश आवश्यक होंगे।
  • समयबद्ध नियामक कार्रवाई पर जोर दिया जाना चाहिए।
  • न्यायिक समीक्षा को मुख्यतः वैधता और प्रक्रिया तक सीमित रखना चाहिए।
  • इससे अनिश्चितता घटेगी और पर्यावरण शासन में विश्वास बहाल होगा।

आगे की राह

  • न्यायिक हस्तक्षेप का उद्देश्य होना चाहिए:
    • वैधानिक संस्थाओं को सुदृढ़ करना।
    • अत्यधिक व्यापक और समान नियमों से बचना।
    • निर्देशों में बदलाव के लिए स्पष्ट साक्ष्य और व्यवहार्यता मानदंड तय करना।
  • इससे:
    • नियामक संस्थाएँ अधिकार के साथ कार्य कर सकेंगी।
    • सरकारें खंडित अनुपालन से बच सकेंगी।
    • नागरिकों को यह स्पष्ट होगा कि पर्यावरणीय क्षति को कहाँ और कैसे चुनौती दी जाए।

निष्कर्ष

  • सर्वोच्च न्यायालय की पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता निर्विवाद है।
  • किंतु जब न्यायिक शासन, नियामक शासन का स्थान ले लेता है, तो स्थिरता के बजाय अनिश्चितता उत्पन्न होती है।
  • पर्यावरण की रक्षा निरंतर न्यायिक प्रबंधन से नहीं, बल्कि स्थिर नियमों, जवाबदेह नियामकों और स्पष्ट संवैधानिक सीमाओं से होती है।
  • यदि न्यायालय अपनी भूमिका को नियामक से संवैधानिक संरक्षक के रूप में पुनर्संतुलित करता है, तो पर्यावरण और विधि के शासन दोनों की रक्षा संभव होगी।

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