The Hindu Editorial Analysis in Hindi
28 January 2026
गिरते रुपये का समाधान कूटनीति में है।
(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-8 )
विषय: जीएस पेपर – जीएस 2 और जीएस 3: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, भारतीय अर्थव्यवस्था, बाहरी क्षेत्र, विनिमय दर प्रबंधन
प्रसंग
• हाल के महीनों में भारतीय रुपये में तेज गिरावट ने बाजारों और जनमत दोनों को असहज कर दिया है।
• यह गिरावट ऐसे समय में हुई है जब भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति मजबूत बनी हुई है।
• भारत में आर्थिक वृद्धि दर ऊँची है, मुद्रास्फीति नियंत्रित है और चालू खाता घाटा सीमित है।
• इसके बावजूद अप्रैल 2025 से अब तक रुपये में लगभग 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
• संपादकीय का तर्क है कि रुपये की कमजोरी के कारण अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि बढ़ते हुए भू-राजनीतिक हैं।

मुख्य मुद्दा
• मुख्य प्रश्न यह है कि मजबूत आर्थिक बुनियाद के बावजूद रुपया क्यों कमजोर हो रहा है।
• तर्क यह है कि समाधान अब आर्थिक प्रबंधन से अधिक कूटनीतिक संवाद में निहित है।
मजबूत अर्थव्यवस्था, कमजोर मुद्रा का विरोधाभास
• भारत के प्रमुख आर्थिक संकेतक सुदृढ़ बने हुए हैं।
• सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर लगभग 7.4 प्रतिशत आंकी गई है।
• उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति आरबीआई के लक्ष्य दायरे में रही है।
• वित्त वर्ष 2025–26 की पहली छमाही में चालू खाता घाटा घटकर जीडीपी का लगभग 0.76 प्रतिशत रह गया है।
• सामान्य परिस्थितियों में ऐसे संकेतक मुद्रा स्थिरता का समर्थन करते हैं।
• इसके बावजूद रुपये की लगातार गिरावट यह दर्शाती है कि गैर-आर्थिक दबाव काम कर रहे हैं।
वास्तविक कारण: पूंजी का बहिर्वाह
• आम धारणा के विपरीत व्यापार घाटा रुपये की गिरावट का मुख्य कारण नहीं है।
• सबसे बड़ा कारण विदेशी पूंजी का बाहर जाना है।
• अप्रैल–दिसंबर 2024 में जहाँ 10.6 अरब डॉलर का शुद्ध पूंजी प्रवाह था, वहीं 2025 की समान अवधि में 3.9 अरब डॉलर का शुद्ध बहिर्वाह हुआ।
• यह परिवर्तन भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते व्यापार तनाव के साथ जुड़ा हुआ है।
• अमेरिकी सरकार द्वारा भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत शुल्क लगाया गया है।
• इसके अतिरिक्त भारत के कच्चे तेल आयात से जुड़े और शुल्क लगाने की धमकियों ने निवेशकों को चिंतित किया है।
• ऐसे वातावरण में निवेशक आर्थिक बुनियाद की बजाय भू-राजनीतिक जोखिम पर प्रतिक्रिया करते हैं।
अर्थशास्त्र से कूटनीति की ओर बदलाव
• वर्ष 2022 में रुपये में लगभग 10 प्रतिशत गिरावट मुख्यतः आर्थिक कारणों से हुई थी, विशेषकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में तेज वृद्धि के कारण।
• वर्तमान गिरावट के पीछे कोई स्पष्ट आर्थिक झटका नहीं दिखता।
• आज रुपये की कमजोरी निम्न कारणों को दर्शाती है:
– शुल्कों का भू-राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग
– आक्रामक व्यापार रुख से उत्पन्न अनिश्चितता
– भय-प्रेरित पूंजी पलायन
• इससे स्पष्ट होता है कि समस्या आर्थिक से अधिक कूटनीतिक है।
आरबीआई की भूमिका और सीमाएँ
• भारत में विनिमय दर प्रणाली बाजार-निर्धारित है।
• इसके बावजूद भारतीय रिज़र्व बैंक अस्थिरता को कम करने के लिए हस्तक्षेप करता है।
• आरबीआई का उद्देश्य रुपये को किसी निश्चित स्तर पर बाँधना नहीं, बल्कि अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है।
• बाहरी झटकों के कारण होने वाली तेज गिरावट को धीमा करना आरबीआई की भूमिका है।
• परंतु जब पूंजी बहिर्वाह लगातार और भू-राजनीतिक कारणों से हो, तब हस्तक्षेप की प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
• आरबीआई गिरावट की गति को नियंत्रित कर सकता है, दिशा को पूरी तरह पलट नहीं सकता।
मुद्रा अवमूल्यन समाधान क्यों नहीं है
• आमतौर पर कमजोर मुद्रा को निर्यात बढ़ाने वाला माना जाता है।
• वर्तमान परिस्थिति में यह तर्क कमजोर पड़ जाता है।
• भारत के निर्यात में आयात-निर्भर वस्तुओं की हिस्सेदारी बढ़ गई है।
• अमेरिकी शुल्कों के कारण भारतीय निर्यात पहले ही प्रतिस्पर्धात्मक दबाव में है।
• आयात पक्ष पर भारत आवश्यक वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भर है।
• केवल कच्चा तेल ही कुल आयात का लगभग 25 प्रतिशत है।
• रुपये में और गिरावट से आयात महँगा होगा।
• इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी और घरेलू मूल्य स्थिरता पर असर पड़ेगा।
• मुद्रा अवमूल्यन तब उचित होता है जब देशों के बीच मुद्रास्फीति अंतर हो, जो वर्तमान में भारत के मामले में नहीं है।
वास्तविक प्रभावी विनिमय दर का महत्व
• संपादकीय नाममात्र विनिमय दर की बजाय वास्तविक प्रभावी विनिमय दर पर ध्यान देने की बात करता है।
• वास्तविक प्रभावी विनिमय दर मुद्रास्फीति अंतर और व्यापार भारित मुद्रा परिवर्तनों को समायोजित करती है।
• जानबूझकर मुद्रा को कमजोर रखना मुद्रा हेरफेर के समान है।
• यह रणनीति विवादास्पद और जोखिमपूर्ण होती है।
• दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता विनिमय दर विकृति से नहीं बनाई जा सकती।
कूटनीति ही स्थायी समाधान
• रुपये की गिरावट भय-जनित पूंजी बहिर्वाह का परिणाम है।
• इसका प्रमुख कारण भारत–अमेरिका व्यापार तनाव है।
• रुपये की प्रत्येक गिरावट विदेशी निवेशकों के लिए अपेक्षित प्रतिफल को बढ़ा देती है।
• पूंजी बहिर्वाह से शेयर बाजार और वित्तीय स्थिरता प्रभावित होती है।
• अनिश्चितता बनी रहने पर बहिर्वाह और तेज हो सकता है।
• इसलिए अमेरिका के साथ समय पर और प्रभावी व्यापार कूटनीति अत्यंत आवश्यक है।
• कूटनीतिक समाधान के बिना न तो मौद्रिक नीति और न ही बाजार हस्तक्षेप स्थायी स्थिरता ला सकते हैं।
निष्कर्ष
• रुपये की मौजूदा गिरावट भारत की आर्थिक कमजोरी का प्रमाण नहीं है।
• यह भू-राजनीतिक तनावों और व्यापार टकरावों का प्रतिबिंब है।
• आज के दौर में मुद्रा स्थिरता विदेश नीति से अलग नहीं रह गई है।
• आरबीआई अस्थिरता को सीमित कर सकता है, पर स्थायी समाधान नहीं दे सकता।
• स्थायी समाधान व्यापार वार्ता, कूटनीतिक संवाद और निवेशकों के विश्वास की बहाली में निहित है।
• इसलिए रुपये की समस्या का उत्तर न अवमूल्यन में है, न मौद्रिक चालों में, बल्कि रणनीतिक कूटनीति में है।