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AI में आने वाला उछाल, इसके ग्लोबल नतीजे

(Source – The Hindu, International Edition, Page no.-10 )

विषय: GS 3: साइंस और टेक्नोलॉजी (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), सिक्योरिटी, डिफेंस टेक्नोलॉजी, GS 2: इंटरनेशनल रिलेशन, ग्लोबल गवर्नेंस, टेक्नोलॉजी में एथिकल इश्यू

प्रसंग

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) अब भविष्य की कल्पना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संरचना, शासन प्रणाली, युद्ध सिद्धांत और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को पुनर्परिभाषित करने वाली तीव्र गति से विकसित हो रही वास्तविकता है। विशेषकर बड़े भाषा मॉडल (LLMs) और स्वायत्त प्रणालियों के विकास के साथ, विश्व एक ऐसे परिवर्तन के दौर में है जिसकी तुलना औद्योगिक क्रांतियों से की जा सकती है।

किन्तु यह परिवर्तन केवल उत्पादकता या संचार तक सीमित नहीं है; यह सैन्य संतुलन, राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियाद को भी प्रभावित कर सकता है।

एआई: केवल नवाचार नहीं, संरचनात्मक व्यवधान

एआई एक सामान्य तकनीकी उपकरण नहीं है, बल्कि एक प्रणालीगत बदलाव है, जो निम्न क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है:

  • सूचना प्रवाह और संचार
  • निगरानी और खुफिया तंत्र
  • विश्लेषणात्मक एवं निर्णय-निर्माण ढाँचा
  • सैन्य-औद्योगिक संरचना
  • कूटनीति और शासन व्यवस्था

पूर्ववर्ती तकनीकों के विपरीत, एआई स्वयं-सुधार करने वाली प्रणालियों के रूप में विकसित हो रही है और मानव-नियंत्रित ढाँचे से अर्ध-स्वायत्त तथा संभावित रूप से पूर्णतः स्वायत्त प्रणालियों की ओर अग्रसर है।


भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और शक्ति संतुलन

संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच एआई प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक रणनीतिक संतुलन को पुनर्गठित कर दिया है। एआई अब निम्न क्षेत्रों में एक केंद्रीय भूमिका निभा रहा है:

  • आर्थिक प्रभाव
  • वित्तीय अवसंरचना
  • आपूर्ति शृंखला की स्थिरता
  • सामरिक प्रतिरोध क्षमता

जो देश एआई क्षमताओं में पीछे रह जाते हैं, वे रणनीतिक रूप से हाशिए पर जा सकते हैं। इससे तकनीक के हथियारीकरण और आर्थिक विखंडन की आशंकाएँ बढ़ती हैं।


एआई और सैन्यीकरण

युद्ध के क्षेत्र में एआई का प्रभाव अत्यंत गहरा है। एआई-संचालित प्रणालियाँ निम्न प्रकार से युद्ध की प्रकृति बदल रही हैं:

  • स्वायत्त ड्रोन और मानव रहित वाहन
  • बुद्धिमान नेविगेशन और लक्ष्य निर्धारण
  • वास्तविक समय युद्धक्षेत्र विश्लेषण
  • परिचालन निर्णयों का स्वचालन

हालिया संघर्षों ने दर्शाया है कि अपेक्षाकृत सस्ती एआई-आधारित तकनीकें पारंपरिक सैन्य श्रेष्ठता को चुनौती दे सकती हैं। यह मानव-निर्देशित युद्ध से स्वायत्त युद्ध की ओर संक्रमण का संकेत है।

सबसे बड़ा खतरा केवल क्षमता-वृद्धि नहीं, बल्कि मानव नियंत्रण से परे संचालन की संभावना है।


युद्धक्षेत्र से परे जोखिम

एआई का प्रभाव नागरिक संस्थानों तक भी फैल रहा है:

  • न्यायिक प्रणाली: एआई-जनित “हैलुसिनेशन” से गलत उद्धरण या त्रुटिपूर्ण निर्णय का जोखिम।
  • कूटनीति और खुफिया: एआई-आधारित विश्लेषण से भू-राजनीतिक निर्णयों पर प्रभाव।
  • सूचना पारिस्थितिकी: दुष्प्रचार, डीपफेक और व्यापक निगरानी।
  • शक्ति का केंद्रीकरण: एआई अवसंरचना पर नियंत्रण कुछ कॉर्पोरेट या राज्य इकाइयों में शक्ति केंद्रित कर सकता है।

एआई की गति, विस्तार और स्वायत्तता इसे विशिष्ट रूप से अस्थिरकारी बना सकती है।


स्वायत्तता का प्रश्न: मानव नियंत्रण बनाम मशीन एजेंसी

जैसे-जैसे एआई प्रणालियाँ:

  • स्वयं सीखने वाली
  • स्वयं सुधार करने वाली
  • बहु-क्षेत्रीय रूप से एकीकृत

होती जा रही हैं, वे परामर्शी उपकरणों से स्वतंत्र परिचालन इकाइयों में परिवर्तित हो सकती हैं।

यह तत्काल मशीन विद्रोह का खतरा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे मानव अधिकार-हस्तांतरण का जोखिम है, जहाँ जवाबदेही कमजोर पड़ सकती है।

यह परिवर्तन प्रथम विश्व युद्ध में टैंकों के प्रवेश जितना निर्णायक हो सकता है, जिसने युद्ध की प्रकृति को स्थायी रूप से बदल दिया।


शासन-घाटा और नियमन की आवश्यकता

वैश्विक स्तर पर एआई की विघटनकारी क्षमता को अभी पूर्णतः स्वीकार नहीं किया गया है। आवश्यक कदमों में शामिल हैं:

  • सैन्य एआई के लिए अंतरराष्ट्रीय मानदंड
  • नागरिक उपयोग हेतु नैतिक ढाँचा
  • अनियंत्रित प्रणालियों के विरुद्ध नियामक सुरक्षा
  • एआई निर्णय प्रक्रियाओं की पारदर्शी ऑडिट
  • वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय

अत्यधिक नियमन नवाचार को बाधित कर सकता है, जबकि अपर्याप्त नियमन अस्थिरता को जन्म दे सकता है।


वैश्विक प्रभाव

यदि एआई अनियंत्रित रहा, तो वह:

  • हथियारों की दौड़ को तेज कर सकता है
  • तकनीकी रूप से उन्नत और पिछड़े देशों के बीच असमानता बढ़ा सकता है
  • श्रम बाजार और शासन संस्थानों को अस्थिर कर सकता है
  • लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर कर सकता है
  • तकनीकी शक्ति का केंद्रीकरण कर सकता है

इसके साथ ही, एआई स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन, विश्लेषण और आर्थिक दक्षता में विशाल अवसर भी प्रदान करता है। चुनौती इसके दोहरे उपयोग (dual-use) स्वरूप का संतुलित प्रबंधन है।


निष्कर्ष

एआई का उभार केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन, युद्ध और शासन का संरचनात्मक पुनर्गठन है। प्रश्न यह नहीं है कि एआई विश्व को बदलेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या मानव समाज मजबूत नियंत्रण और संतुलन तंत्र विकसित कर पाएगा, इससे पहले कि तकनीक संस्थागत नियंत्रण से आगे निकल जाए।

प्रभावी निगरानी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नैतिक शासन ही यह निर्धारित करेंगे कि एआई मानव प्रगति का गुणक बनेगा या शक्ति के केंद्रीकरण का अस्थिरकारी साधन।

आगामी एआई युग को प्रतिक्रियात्मक भय से नहीं, बल्कि दूरदर्शी रणनीति से संचालित करने की आवश्यकता है।

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