The Hindu Editorial Analysis in Hindi
12 May 2026
भारत-वियतनाम रणनीतिक साझेदारी में एक नया चरण
(Source – The Hindu, International Edition – Page No. – 8)
विषय: GS पेपर: GS-2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध) और GS-3 (सुरक्षा, हिंद-प्रशांत, रक्षा सहयोग)
संदर्भ
संपादकीय में वर्ष 2026 में वियतनाम के राष्ट्रपति टो लाम की भारत यात्रा के बाद भारत–वियतनाम रणनीतिक साझेदारी के बढ़ते महत्व का विश्लेषण किया गया है। इसमें दोनों देशों के संबंधों को “Enhanced Comprehensive Strategic Partnership” तक उन्नत किए जाने तथा उसके इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर प्रभावों को रेखांकित किया गया है।

मुख्य मुद्दा
मुख्य मुद्दा बदलते इंडो-पैसिफिक परिदृश्य में भारत और वियतनाम के बीच बढ़ते रणनीतिक सामंजस्य का है, विशेष रूप से:
• रक्षा एवं समुद्री सहयोग
• आपूर्ति शृंखला विविधीकरण
• दक्षिण चीन सागर में दबावपूर्ण गतिविधियों के विरुद्ध रणनीतिक संतुलन
मुख्य प्रश्न:
क्या भारत–वियतनाम साझेदारी भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति का प्रमुख स्तंभ बन सकती है?
भारत–वियतनाम संबंधों का विकास
• भारत की “Look East” और बाद में “Act East” नीति ने मजबूत संबंधों की आधारशिला रखी।
• 2016 में संबंधों को “Comprehensive Strategic Partnership” का दर्जा दिया गया।
• नियमित रूप से:
• उच्चस्तरीय राजनीतिक वार्ताएँ
• रक्षा संवाद
• क्षमता निर्माण कार्यक्रम
अवलोकन:
द्विपक्षीय संबंध धीरे-धीरे बहुआयामी रणनीतिक साझेदारी में विकसित हुए हैं।
रक्षा सहयोग : मुख्य आधार
सहयोग के प्रमुख क्षेत्र:
• समुद्री सुरक्षा सहयोग
• रक्षा प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण
• रक्षा ऋण सहायता और सैन्य सहयोग
• INS Kirpan जैसे सैन्य प्लेटफॉर्म का हस्तांतरण
वर्तमान फोकस:
• वियतनाम को ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात की संभावना
निहितार्थ:
प्रतीकात्मक सहयोग से आगे बढ़कर वास्तविक सैन्य क्षमता निर्माण और प्रतिरोधक शक्ति विकसित करने की दिशा में कदम।
इंडो-पैसिफिक रणनीतिक सामंजस्य
दोनों देशों की प्रमुख चिंताएँ:
• समुद्री दबाव और आक्रामक गतिविधियाँ
• आपूर्ति शृंखला की असुरक्षा
• रणनीतिक स्वायत्तता
साझा प्रतिबद्धता:
• नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था
• नौवहन की स्वतंत्रता
• क्षेत्रीय स्थिरता
अवलोकन:
भारत और वियतनाम अब एक-दूसरे को इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक संतुलनकारी साझेदार के रूप में देखने लगे हैं।
आर्थिक एवं आपूर्ति शृंखला सहयोग
• द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
• प्रमुख सहयोग क्षेत्र:
• सेमीकंडक्टर एवं प्रौद्योगिकी
• डिजिटल भुगतान एकीकरण
• दुर्लभ मृदा तत्व एवं महत्वपूर्ण खनिज
• विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाएँ
महत्त्व:
वियतनाम भारत की “China Plus One” रणनीति में महत्वपूर्ण भागीदार बनकर उभर रहा है।
आसियान (ASEAN) आयाम
• ASEAN में वियतनाम का रणनीतिक महत्व भारत की क्षेत्रीय पहुँच को मजबूत करता है।
• हनोई की विविधीकृत विदेश नीति भारत की बहु-संरेखण (Multi-alignment) रणनीति के अनुकूल है।
निहितार्थ:
वियतनाम दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की गहरी भागीदारी का प्रवेशद्वार बन सकता है।
भूराजनैतिक महत्व
यह साझेदारी निम्नलिखित में योगदान देती है:
• इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक संतुलन
• वैकल्पिक आर्थिक संरचनाओं का निर्माण
• चीन-केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता में कमी
अवलोकन:
भारत–वियतनाम संबंध अब आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग का संयुक्त स्वरूप ग्रहण कर रहे हैं।
चुनौतियाँ एवं संरचनात्मक सीमाएँ
मुख्य चुनौतियाँ:
• रक्षा निर्यात क्रियान्वयन में बाधाएँ
• कानूनी एवं लॉजिस्टिक समस्याएँ
• वित्तीय एवं औद्योगिक समन्वय की कमी
• निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी
चिंता:
रणनीतिक इच्छाशक्ति को वास्तविक परिणामों में बदलना आवश्यक है।
भविष्य के सहयोग क्षेत्र
संभावित विस्तार क्षेत्र:
• उभरती प्रौद्योगिकियाँ
• समुद्री क्षेत्र जागरूकता (Maritime Domain Awareness)
• साइबर सुरक्षा
• महत्वपूर्ण खनिज
• रक्षा विनिर्माण एवं सह-उत्पादन
अवलोकन:
यह साझेदारी दीर्घकालिक रणनीतिक एकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रही है।
आगे की राह
• रक्षा समझौतों के क्रियान्वयन में तेजी लाई जाए।
• समुद्री एवं नौसैनिक सहयोग का विस्तार किया जाए।
• आपूर्ति शृंखला लचीलापन पहलों को मजबूत किया जाए।
• निजी क्षेत्र और तकनीकी सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए।
• इंडो-पैसिफिक रणनीतिक संवादों को संस्थागत रूप दिया जाए।
निष्कर्ष
भारत–वियतनाम साझेदारी इंडो-पैसिफिक की बदलती वास्तविकताओं के बीच एक नए और महत्वपूर्ण रणनीतिक चरण में प्रवेश कर चुकी है।
रक्षा सहयोग, आर्थिक लचीलापन और साझा रणनीतिक हितों के माध्यम से दोनों देश एक परिपक्व और बहुआयामी साझेदारी का निर्माण कर रहे हैं।
इस साझेदारी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राजनीतिक सामंजस्य को कितनी प्रभावी ढंग से संस्थागत, आर्थिक और सुरक्षा परिणामों में बदला जा सकता है।