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ईरान युद्ध: भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के समक्ष चुनौतियाँ

(Source – The Hindu, International Edition – Page No. – 8)

विषय: GS पेपर: GS-2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध) और GS-3 (ऊर्जा सुरक्षा, बाह्य क्षेत्र, रणनीतिक मामले)

प्रसंग

संपादकीय में यह विश्लेषण किया गया है कि ईरान संकट तथा पश्चिम एशिया में जारी व्यापक भू-राजनीतिक अस्थिरता ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के सामने गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इसमें तर्क दिया गया है कि यह संघर्ष भारत की उस क्षमता की परीक्षा ले रहा है, जिसके माध्यम से वह प्रतिस्पर्धी साझेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपने आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों की रक्षा कर सके।

मुख्य मुद्दा

मुख्य समस्या यह है कि बढ़ते वैश्विक ध्रुवीकरण और भू-राजनीतिक दबाव के बीच भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना कठिन होता जा रहा है, विशेषकर निम्न कारणों से:

• अमेरिका द्वारा रणनीतिक संरेखण की बढ़ती अपेक्षाएँ
• ईरान से जुड़ी ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ
• यूरोप और अमेरिका की उभरती रणनीतिक गणनाएँ

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है:

क्या भारत अधिक विखंडित होती वैश्विक व्यवस्था में बहु-संरेखण (Multi-alignment) और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को जारी रख पाएगा?

भारत के लिए ईरान का महत्व

ईरान में भारत के लंबे समय से जुड़े हित:

• ऊर्जा सुरक्षा
• पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुँच
• चाबहार बंदरगाह के माध्यम से रणनीतिक संपर्क
• भू-राजनीतिक संतुलन बनाए रखने का अवसर

महत्त्व:

ईरान भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और यूरेशिया तक पहुँच का मार्ग प्रदान करता है।

निहितार्थ:

क्षेत्रीय अस्थिरता सीधे भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को प्रभावित करती है।

दबाव में रणनीतिक स्वायत्तता

भारत ने पारंपरिक रूप से निम्नलिखित नीति अपनाई:

• स्वतंत्र विदेश नीति विकल्प
• औपचारिक गठबंधनों के बजाय बहु-संरेखण
• प्रतिस्पर्धी शक्तियों के साथ समानांतर संबंध

उदाहरण:

• अमेरिका के साथ संबंध
• रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी
• ईरान के साथ सहयोग
• हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विस्तारित साझेदारियाँ

अवलोकन:

रणनीतिक स्वायत्तता ऐतिहासिक रूप से लचीलापन आधारित रही है, न कि गुटीय राजनीति पर।

अमेरिकी दबाव की बदलती प्रकृति

संपादकीय के अनुसार हाल की अमेरिकी नीतियाँ निम्न प्रवृत्तियाँ दर्शाती हैं:

• आर्थिक दबाव के बढ़ते उपयोग
• रणनीतिक अनुरूपता की अपेक्षा
• आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों के बीच बढ़ता संबंध

उदाहरण:

• रूसी तेल आयात पर दबाव
• डॉलर-विहीन व्यवस्था (De-dollarisation) के प्रयासों का विरोध
• ईरान संबंधी सहयोग पर अपेक्षाएँ

चिंता:

आर्थिक परस्पर निर्भरता अब भू-राजनीतिक असुरक्षा का कारण बनती जा रही है।

भारत–यूरोप साझेदारी की सीमाएँ

हाल के घटनाक्रम:

• भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की प्रगति
• फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान की खरीद

प्रारंभिक अपेक्षा:

यूरोप के साथ मजबूत संबंध भारत के रणनीतिक विकल्पों में विविधता लाएँगे।

हालाँकि:

संकट की स्थिति में यूरोप अमेरिकी रुख के साथ खड़ा हो सकता है।

निहितार्थ:

साझेदारों में विविधता हमेशा स्वतंत्र रणनीतिक क्षेत्र सुनिश्चित नहीं करती।

रक्षा और प्रौद्योगिकी निर्भरता की चुनौतियाँ

उठाई गई प्रमुख चिंताएँ:

• प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की सीमाएँ
• विदेशी उन्नयन और प्रणालियों पर निर्भरता
• घरेलू विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं पर बाधाएँ

मुख्य मुद्दा:

आयातित रक्षा प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है।

ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक जोखिम

ईरान संकट के प्रभाव:

• तेल बाजार में व्यवधान
• आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता
• हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा संबंधी चिंताएँ

परिणाम:

भारत मुद्रास्फीति और आर्थिक असुरक्षा का सामना कर सकता है।

अवलोकन:

रणनीतिक स्वायत्तता अब आर्थिक स्थिरता और लचीलापन से भी जुड़ गई है।

उभरती वैश्विक व्यवस्था

संपादकीय के अनुसार:

• अमेरिका-नेतृत्व वाली उदार वैश्विक व्यवस्था दबाव में है
• यूरोप अमेरिकी रणनीतिक हितों के साथ अधिक निकटता विकसित कर सकता है
• बहुध्रुवीयता असमान और प्रतिस्पर्धी बनी रह सकती है

चिंता:

वैश्विक दक्षिण के देशों पर प्रतिस्पर्धी गुटों का दबाव बढ़ सकता है।

भारत के सामने चुनौतियाँ

मुख्य कठिनाइयाँ:

• अमेरिका, रूस, ईरान और यूरोप के साथ समानांतर संतुलन बनाए रखना
• दबावपूर्ण परिस्थितियों में नीति की स्वतंत्रता बनाए रखना
• ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों में रणनीतिक कमजोरियों को कम करना

अवलोकन:

अब रणनीतिक स्वायत्तता के लिए केवल कूटनीतिक संतुलन पर्याप्त नहीं है; आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता भी आवश्यक हो गई है।

आगे की राह

• ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति मार्गों में विविधता लाई जाए
• आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत घरेलू रक्षा उत्पादन को सुदृढ़ किया जाए
• महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता कम की जाए
• औपचारिक सैन्य गठबंधनों से बचते हुए रणनीतिक साझेदारियाँ बढ़ाई जाएँ
• आर्थिक स्थिरता और वैकल्पिक संपर्क मार्गों को मजबूत किया जाए

निष्कर्ष

ईरान संकट केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में भारत की रणनीतिक सोच की परीक्षा है। जैसे-जैसे वैश्विक गठबंधन अधिक परिवर्तनशील और दबावपूर्ण होते जा रहे हैं, रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए भारत को केवल कूटनीतिक संतुलन ही नहीं, बल्कि आर्थिक और तकनीकी आत्मसुदृढ़ीकरण पर भी ध्यान देना होगा। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भविष्य की भूमिका उसकी स्वतंत्रता बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी, बिना स्वयं को अलग-थलग किए।

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