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The Hindu Editorial in Hindi

09 June 2026

SIR का समर्थन और एक चिंताजनक फ़ैसला

(स्रोत – द हिंदू, एडिटोरियल पेज नंबर – 8)

विषय: GS-2 (राजव्यवस्था और शासन), GS-2 (चुनाव आयोग), GS-2 (संवैधानिक निकाय)

Context

संपादकीय 27 मई 2026 के उस सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की आलोचनात्मक समीक्षा करता है, जिसमें भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा कराए गए निर्वाचक नामावलियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को वैध ठहराया गया। लेख का तर्क है कि यह निर्णय निर्वाचन आयोग को अत्यधिक विवेकाधिकार प्रदान करता है तथा निर्वाचक नामावली संशोधन से जुड़े वैधानिक सुरक्षा प्रावधानों को कमजोर कर सकता है, जिससे नागरिकों के मताधिकार पर प्रभाव पड़ सकता है।

Core Argument

संपादकीय का मुख्य तर्क है कि SIR को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकृति दिए जाने से निर्वाचन आयोग को अत्यधिक प्रशासनिक अधिकार प्राप्त हो जाते हैं, जबकि इससे मतदाता सूची संशोधन संबंधी कानूनी और लोकतांत्रिक सुरक्षा उपाय कमजोर पड़ सकते हैं।

निर्वाचक नामावली का संवैधानिक आधार

प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 324

• चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति भारत निर्वाचन आयोग को प्रदान करता है।

अनुच्छेद 325

• प्रत्येक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य निर्वाचक नामावली का प्रावधान करता है।
• धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या अन्य समान आधारों पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर करने पर रोक लगाता है।

अनुच्छेद 326

• सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage) की व्यवस्था करता है।
• 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक नागरिक, विधि द्वारा निर्धारित अयोग्यताओं को छोड़कर, मतदान का अधिकार रखता है।

अनुच्छेद 327

• संसद को चुनावों से संबंधित कानून बनाने का अधिकार देता है।

निर्वाचक नामावली संशोधन का कानूनी ढाँचा

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950

धारा 21(2)

निर्वाचक नामावली के पुनरीक्षण का प्रावधान करती है:

• आम चुनावों से पूर्व
• उपचुनावों से पूर्व
• संक्षिप्त (Summary) या गहन (Intensive) पुनरीक्षण के रूप में

धारा 21(3)

निर्वाचन आयोग को अनुमति देती है कि वह:

• विशेष पुनरीक्षण (Special Revision) करा सके
• किसी निर्वाचन क्षेत्र अथवा उसके किसी भाग में
• उचित कारण दर्ज करने के पश्चात

निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960

नियम 25

निम्नलिखित प्रक्रियाओं का प्रावधान करता है:

• संक्षिप्त पुनरीक्षण
• गहन पुनरीक्षण

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है?

निर्वाचन आयोग के अनुसार:

SIR एक व्यापक सत्यापन अभियान है, जिसका उद्देश्य है:

• निर्वाचक नामावली को अद्यतन करना
• अयोग्य प्रविष्टियों को हटाना
• मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना

यह प्रक्रिया पहले बिहार में लागू की गई तथा बाद में अन्य राज्यों के संदर्भ में भी चर्चा में रही।

संपादकीय द्वारा उठाई गई प्रमुख चिंताएँ

संदिग्ध कानूनी आधार

संपादकीय का तर्क है कि:

• गहन पुनरीक्षण सामान्यतः धारा 21(2) से जुड़ा हुआ है।
• धारा 21(3) के अंतर्गत विशेष पुनरीक्षण का प्रावधान है, परंतु इसमें गहन पुनरीक्षण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

चिंता:

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की इस व्याख्या को स्वीकार कर लिया कि SIR को धारा 21(3) के अंतर्गत उचित ठहराया जा सकता है, जबकि कानून में इस विषय पर स्पष्टता नहीं है।

पुनरीक्षण का समय

संपादकीय इंगित करता है कि:

• गहन पुनरीक्षण चुनावों के ठीक पहले कराया गया।
• ऐसी प्रक्रिया समय-साध्य और प्रशासनिक रूप से जटिल होती है।

चिंता:

चुनावों से ठीक पहले बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण से:

• भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है
• मतदाताओं के नाम हट सकते हैं
• त्रुटियों के सुधार के अवसर सीमित हो सकते हैं

मतदाता बहिष्करण (Voter Exclusion) का जोखिम

संपादकीय के अनुसार:

• लाखों नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं।
• प्रभावित नागरिकों को पर्याप्त अपील या सुधार का अवसर नहीं मिल सकता।

संभावित परिणाम:

• मताधिकार से वंचित होना
• मतदान में भागीदारी कम होना
• न्यायिक विवादों में वृद्धि

नागरिकता सत्यापन विवाद

सबसे बड़ी आलोचना निर्वाचन आयोग की नागरिकता संबंधी भूमिका को लेकर है।

संपादकीय का तर्क

परंपरागत रूप से:

• नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत होता है।
• इसका प्रशासन गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा किया जाता है।

निर्वाचन आयोग की भूमिका:

• मतदाता पात्रता की जाँच करना
• स्वतंत्र रूप से नागरिकता निर्धारित करना नहीं

उठाई गई चिंता

संपादकीय का दावा है कि:

• निर्वाचन आयोग ने नागरिकता सिद्ध करने के लिए दस्तावेज निर्धारित किए।
• इससे आयोग को ऐसे कार्य करने का अवसर मिला जो सामान्यतः नागरिकता निर्धारण से जुड़े होते हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

संभावित प्रभाव:

• मतदाता सूची में नाम शामिल या हटाया जाना
• मतदान के अधिकार पर असर
• प्रशासनिक अनिश्चितता

व्यापक लोकतांत्रिक चिंताएँ

संपादकीय का मत है कि निर्वाचक नामावली लोकतंत्र की आधारशिला है।

अतः किसी भी पुनरीक्षण प्रक्रिया में सुनिश्चित होना चाहिए:

• पारदर्शिता
• विधिसम्मत प्रक्रिया (Due Process)
• प्राकृतिक न्याय (Natural Justice)
• पर्याप्त सूचना
• प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र

चिंता:

अत्यधिक प्रशासनिक विवेकाधिकार इन सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकता है।

SIR के समर्थन में तर्क (Counter View)

समर्थकों का तर्क है कि:

• शुद्ध मतदाता सूची स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिए आवश्यक है।
• फर्जी और दोहराव वाली प्रविष्टियाँ चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं।
• अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को पर्याप्त संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं।
• समय-समय पर सत्यापन लोकतांत्रिक वैधता को मजबूत करता है।

अतः बहस का मूल प्रश्न है:

निर्वाचन शुचिता (Electoral Integrity) बनाम निर्वाचन समावेशन (Electoral Inclusion)

UPSC Value Addition

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के प्रमुख कार्य

• निर्वाचक नामावली का निर्माण एवं पुनरीक्षण
• चुनावों का संचालन
• राजनीतिक दलों का पंजीकरण
• आदर्श आचार संहिता (MCC) की निगरानी
• स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना

निर्वाचक नामावली प्रबंधन की चुनौतियाँ

• जनसंख्या का प्रवासन
• दोहराव वाली प्रविष्टियाँ
• मृत्यु पंजीकरण से जुड़ी विसंगतियाँ
• समावेशन संबंधी त्रुटियाँ
• बहिष्करण संबंधी त्रुटियाँ
• नागरिकता से जुड़े विवाद
• तकनीकी एवं प्रशासनिक सीमाएँ

संबंधित प्रमुख संवैधानिक सिद्धांत

• सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
• स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव
• विधि का शासन (Rule of Law)
• विधिसम्मत प्रक्रिया (Due Process)
• लोकतांत्रिक सहभागिता

Conclusion

संपादकीय का निष्कर्ष है कि मतदाता सूची की शुद्धता एक वैध और आवश्यक उद्देश्य है, परंतु किसी भी पुनरीक्षण प्रक्रिया को वैधानिक सीमाओं तथा मजबूत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के भीतर संचालित किया जाना चाहिए। चुनावी सुधारों का उद्देश्य केवल अपात्र मतदाताओं को हटाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होना चाहिए कि कोई पात्र नागरिक अपने मतदान अधिकार से वंचित न हो।

स्मरणीय पंक्ति:

“निर्वाचन शुचिता केवल अपात्र मतदाताओं को हटाने से नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने से सुदृढ़ होती है।”


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